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यूपी चुनाव से पहले सपा में बढ़ी मुश्किलें? अखिलेश के ‘इग्नोर करो’ बयान पर मौर्य का पलटवार, बोले- ये कौन होते हैं सर्टिफिकेट देने वाले?

Akhilesh Yadav vs Swami Prasad Maurya

Akhilesh Yadav vs Swami Prasad Maurya: उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव और पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के बीच का जुबानी जंग एक नए और बेहद तीखे मोड़ पर आ गया है। राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी (अपनी जनता पार्टी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव के ‘इग्नोर करो, अवॉइड करो’ वाले बयान पर करारा पलटवार करते हुए यह साफ कर दिया है कि वे यूपी की राजनीति में किसी के सामने झुकने वाले नहीं हैं। 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले विपक्षी ‘INDIA’ गठबंधन के भीतर उभरी यह दरार उत्तर प्रदेश के सियासी समीकरणों को पूरी तरह से गर्मा चुकी है।

Akhilesh Yadav vs Swami Prasad Maurya: अखिलेश यादव का “अवॉइड करो” बयान

इस ताजा विवाद की पटकथा 30 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में समाजवादी पार्टी के राज्य कार्यालय में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान लिखी गई। जब पत्रकारों ने अखिलेश यादव से पूछा कि क्या स्वामी प्रसाद मौर्य आगामी चुनावों में INDIA गठबंधन का हिस्सा होंगे, तो सपा प्रमुख का गुस्सा फूट पड़ा। अखिलेश यादव ने दोटूक शब्दों में कहा, “स्वामी प्रसाद मौर्य हमारे गठबंधन में शामिल नहीं हैं। वह हमारी सीटों की गिनती में भी कहीं नहीं ठहरते हैं। इस मुद्दे को यहीं छोड़ दिया जाना चाहिए… अवॉइड करो, इग्नोर करो। ऐसी बहसों पर चुप्पी साधना ही सबसे बेहतर विकल्प होता है।”

अखिलेश यादव ने यह साफ संदेश दिया कि उत्तर प्रदेश के भीतर गठबंधन की कमान और सीटों का पूरा गणित केवल और केवल समाजवादी पार्टी तय करेगी, और इसमें मौर्य के लिए कोई जगह नहीं है।

स्वामी प्रसाद मौर्य का तीखा पलटवार- “पिद्दी ना पिद्दी का शोरबा”

अखिलेश यादव के इस सार्वजनिक बयान के ठीक एक दिन बाद, 31 अक्टूबर 2026 को स्वामी प्रसाद मौर्य ने बेहद कड़े और आक्रामक लहजे में पलटवार किया। एक समाचार एजेंसी से बातचीत के दौरान मौर्य ने सीधे अखिलेश यादव की राजनीतिक हैसियत पर सवाल खड़े कर दिए। मौर्य ने कहा कि समाजवादी पार्टी विपक्षी गठबंधन की महज एक सहयोगी पार्टी है, वह स्वयं पूरा गठबंधन नहीं हैं। ‘INDIA’ गठबंधन के राष्ट्रीय संयोजक और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे हैं, और अंतिम फैसला लेने का अधिकार भी उन्हीं का है। (Akhilesh Yadav vs Swami Prasad Maurya)

सपा मुखिया पर तीखा हमला बोलते हुए मौर्य ने बेहद आक्रामक मुहावरे का इस्तेमाल किया और कहा “अखिलेश यादव पिद्दी ना पिद्दी का शोरबा। ये कौन होते हैं हमको सर्टिफिकेट देने के लिए?” स्वामी प्रसाद मौर्य ने खुलासा किया कि उन्होंने अपने बेटे उत्कृष्ट मौर्य के साथ दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व से मुलाकात की है। उनकी बातचीत सीधे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस के प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव गुलाम अहमद मीर (गौतम) से हुई है। उन्होंने सपा प्रमुख से न तो कोई बात की और न ही उनके कोटे की सीटों पर कोई टिकट मांगा है।

मौर्य ने आरोप लगाया कि वे अखिलेश यादव के असली चेहरे को पहचान चुके हैं। उन्होंने कहा कि अखिलेश की कुछ गंदी हरकतों के कारण ही उन्होंने पूर्व में सपा का साथ छोड़ा था।

PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की राजनीति पर निशाना

स्वामी प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव के सबसे बड़े चुनावी नारे ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) पर भी गंभीर सवाल उठाए। मौर्य ने आरोप लगाया कि सपा वास्तव में PDA की “दुश्मन नंबर एक” है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि अखिलेश यादव, स्वामी प्रसाद मौर्य और चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं को पसंद नहीं करते, तो फिर वे आखिर किसे चाहते हैं? मौर्य ने इस विवाद में समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान का मुद्दा भी घसीट लिया। उन्होंने कहा कि सपा ने परिमल नथवानी को राज्यसभा भेजा, जबकि उनकी जगह आजम खान की पत्नी को भेजा जाना चाहिए था। मौर्य ने तंज कसा- “जब ये (अखिलेश) संकट के समय आजम खान के नहीं हुए, तो स्वामी प्रसाद मौर्य के क्या होंगे?” (Akhilesh Yadav vs Swami Prasad Maurya)

अखिलेश यादव की नाराजगी के पीछे के 4 बड़े कारण

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अखिलेश यादव द्वारा स्वामी प्रसाद मौर्य को गठबंधन से पूरी तरह बाहर रखने के पीछे कुछ बेहद ठोस रणनीतिक कारण हैं।

  1. विवादित बयान और सॉफ्ट हिंदुत्व- सपा में रहते हुए मौर्य ने सनातन धर्म और रामचरितमानस पर कई विवादित टिप्पणियां की थीं। अखिलेश को डर है कि मौर्य के साथ आने से भाजपा को ध्रुवीकरण का मौका मिलेगा, जिससे सपा की ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और सर्वसमाज को जोड़ने की रणनीति को नुकसान होगा।
  2. पार्टी के भीतर का आंतरिक विद्रोह- मौर्य की बयानबाजी से सपा के कोर सवर्ण और ओबीसी कैडर/विधायकों में भारी नाराजगी थी। उन्हें दोबारा शामिल करने से पार्टी के भीतर आंतरिक कलह मच सकती थी।
  3. ऐन वक्त पर पार्टी छोड़ना (भरोसे का संकट)- 2022 के विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी अखिलेश ने मौर्य को MLC बनाकर पूरा सम्मान दिया था। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मौर्य ने राष्ट्रीय महासचिव पद और पार्टी से इस्तीफा दे दिया, जिसे अखिलेश ने एक बड़ा राजनीतिक विश्वासघात माना।
  4. कांग्रेस को ‘नो-कॉम्प्रमाइज’ का सीधा संदेश- अखिलेश यादव इस कड़े रुख के जरिए कांग्रेस आलाकमान को यह स्पष्ट संकेत देना चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश के भीतर ‘INDIA’ गठबंधन का बॉस कौन है। वे नहीं चाहते कि कांग्रेस राज्य में सपा की सहमति के बिना छोटे दलों को गठबंधन का हिस्सा बनाए। (Akhilesh Yadav vs Swami Prasad Maurya)

यूपी चुनाव से पहले INDIA गठबंधन में बढ़ी खींचतान

उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्वामी प्रसाद मौर्य एक बड़े ओबासी (OBC) चेहरे के रूप में जाने जाते हैं, जो समय-समय पर अपनी राजनीतिक बिसात बदलते रहे हैं। समाजवादी पार्टी से अलग होने के बाद उन्होंने अपनी नई राजनीतिक राह चुनी, लेकिन वर्तमान में वे कांग्रेस के सहारे INDIA गठबंधन के बैनर तले अपनी जमीन तलाश रहे हैं।

अखिलेश यादव और स्वामी प्रसाद मौर्य की यह आपसी जंग कांग्रेस के लिए भी एक बड़ी दुविधा खड़ी करती है। यदि कांग्रेस राहुल गांधी से मौर्य की मुलाकात के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश में अपने कोटे से सीटें देती है, तो समाजवादी पार्टी के साथ उसके संबंधों में खटास आ सकती है। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ा यह नया विवाद यह तय करेगा कि विपक्षी गठबंधन उत्तर प्रदेश में एकजुट रह पाता है या आंतरिक अंतर्विरोधों के कारण बिखर जाता है। (Akhilesh Yadav vs Swami Prasad Maurya)

Vaishali
Author: Vaishali

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