हम 2026 में जी रहे हैं, चांद पर बस्तियां बसाने की बात कर रहे हैं और ‘विश्वगुरु’ बनने का दम भर रहे हैं। लेकिन हरियाणा के हिसार से आई एक खबर ने इन तमाम दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। हिसार के खासा महाजनान गांव में इंसानियत को शर्मसार करने वाली वो तस्वीर सामने आई है, जिसे देखकर आपकी रूह कांप जाएगी। यहाँ ज़िंदा रहते तो इंसान जाति की जिल्लत झेलता ही है, लेकिन मरने के बाद उसकी ‘राख’ के साथ भी भेदभाव किया जा रहा है।

आज से 100 साल पहले जिस ‘छुआछूत’ और ‘भेदभाव’ के खिलाफ महापुरुषों ने जंग लड़ी थी, वो ज़हर आज भी हमारे समाज के दिमाग़ में किसी ‘अविकसित उपज’ की तरह पनप रहा है। खासा महाजनान गांव में अनुसूचित जाति (SC) के लिए एक अलग श्मशान घाट बना दिया गया है। जिसने इंसनियत पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि, क्या मौत के बाद भी इंसान एक समान नहीं है? क्या पंचतत्व में विलीन होने के लिए भी अलग-अलग सरहदें तय की जाएंगी? यह सोच नहीं, बल्कि एक मानसिक बीमारी है जो यह मानती है कि मरने के बाद भी एक इंसान का शव दूसरे से ‘अपवित्र’ हो सकता है।
जरा सोचिए उस परिवार पर क्या गुजरती होगी, जो अपने प्रियजन को खोने के गम में डूबा है, लेकिन समाज उसे यह एहसास दिलाता है कि तुम इस श्मशान के ‘लायक’ नहीं हो। जहाँ अंतिम विदाई में पूरे गांव को साथ खड़ा होना चाहिए, वहाँ जातियों की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं। और यह उस सोच का प्रमाण है जो आज भी इंसान को उसके कर्मों से नहीं, बल्कि उसके जन्म से आंकती है।

हालांकि, इस अमानवीय कृत्य पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने गहरा संज्ञान लिया है। आयोग ने इसे मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन माना है। और आयोग ने जिला प्रशासन से दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने पूछा है कि आखिर किस आधार पर और किन परिस्थितियों में समाज को इस तरह बांटने की इजाजत दी गई?
श्मशान में भी भेदभाव करना उस विधाता का अपमान है जिसने हम सबको एक जैसा बनाया है। जब तक हमारे दिमाग़ से यह ‘जाति का भूत’ नहीं उतरेगा, तब तक हम चाहे कितनी भी तरक्की कर लें, हम एक ‘पिछड़ा समाज’ ही कहलाएंगे। आज देश आपसे पूछता है— क्या आप ऐसे समाज का हिस्सा बने रहना चाहते हैं जहाँ राख की भी जाति देखी जाती है?









