Jantar Mantar protest and hunger strike: दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा प्रदर्शन अब एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। दरअसल, पिछले करीब तीन हफ्तों से जारी यह धरना अब सिर्फ एक सामान्य प्रदर्शन नहीं रहा। बल्कि, यह सरकार के खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक दबाव अभियान बनता जा रहा है। इस आंदोलन में सबसे बड़ा अपडेट यह है कि जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने देश की जनता से सीधे जमीन पर उतरने की अपील की है। उन्होंने साफ कर दिया है कि सिर्फ सोशल मीडिया पर सपोर्ट पोस्ट लिखने या संदेश भेजने से बात नहीं बनेगी। अगर लोग सच में इस मुहिम और छात्रों के साथ हैं, तो उन्हें आगामी 20 जुलाई को दिल्ली आना होगा। जंतर-मंतर पहुंचकर उन्हें संसद तक निकलने वाले शांतिपूर्ण मार्च का हिस्सा बनना होगा।
NEET पेपर लीक से शुरू हुआ था आंदोलन, अब जुड़े कई बड़े मुद्दे
गौरतलब है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह विरोध प्रदर्शन आज 20वें दिन में प्रवेश कर चुका है। यह आंदोलन बीते 20 जून से लगातार चल रहा है।
- शुरुआती मांगें: इस आंदोलन की शुरुआत मुख्य रूप से नीट (NEET) पेपर लीक, देश के एजुकेशन सिस्टम में फैली गड़बड़ियों और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ हुई थी। इसके साथ ही नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को पूरी तरह भंग करने की मांग भी उठाई जा रही है।
- बदला आंदोलन का स्वरूप: शुरुआत में यह सिर्फ छात्रों से जुड़ा एक मुद्दा था। हालांकि, धीरे-धीरे यह प्रशासनिक विफलता, जवाबदेही और राजनीतिक जिम्मेदारी का एक बड़ा राष्ट्रीय सवाल बन गया है।
सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ी, फिर भी अनशन जारी रखने पर अड़े
इस पूरे आंदोलन में सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट 28 जून की रात को आया था। इसी दिन मशहूर पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक छात्रों के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल (Indefinite Hunger Strike) पर बैठ गए थे। आज उनके अनशन का 12वां दिन है। डॉक्टरों की मेडिकल टीम लगातार उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रही है। जांच के मुताबिक, भूख हड़ताल की वजह से उनका वजन 7 किलो से ज्यादा कम हो चुका है और ब्लड प्रेशर भी लगातार नीचे गिर रहा है। इसके बावजूद वांगचुक का कहना है कि वे अभी तुरंत अपना अनशन खत्म नहीं करेंगे। उनका संदेश बिल्कुल साफ है कि जब तक इस समस्या का कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक सिर्फ सहानुभूति दिखाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है।
सोफे से बाहर निकलो: डिजिटल सहानुभूति छोड़ वास्तविक भागीदारी की अपील
पिछले कुछ दिनों में देशभर से हजारों लोगों ने सोनम वांगचुक को संदेश भेजकर स्वास्थ्य के हवाले से अनशन खत्म करने का अनुरोध किया था।
वांगचुक का तीखा सवाल: अपने ताजा वीडियो संदेश में वांगचुक ने इस आंदोलन के मूल मकसद को सामने रखा। उन्होंने पूछा कि अगर वे आज खाना खा भी लें, तो क्या इससे उन छात्रों को न्याय मिल जाएगा जिन्होंने कथित तौर पर परीक्षा के तनाव के कारण अपनी जान गंवा दी? क्या इससे अगले साल ऐसी पेपर लीक जैसी त्रासदियों को रोका जा सकेगा?
उनका मानना है कि जब तक सिस्टम में बुनियादी सुधार नहीं आएगा, तब तक किसी एक व्यक्ति के अनशन तोड़ने से देश के हालात नहीं बदलेंगे। इसी वजह से उन्होंने लोगों को “सोफे से बाहर निकलो” का नारा दिया है, ताकि लोग केवल इंटरनेट पर दुख न जताएं बल्कि जमीनी संघर्ष में भी शामिल हों। अब इस आंदोलन का दायरा भी काफी बड़ा हो चुका है। वांगचुक ने छात्रों के मुद्दों के साथ-साथ लद्दाख की सुरक्षा और हिमालयी पर्यावरण के गंभीर सवालों को भी इस प्रदर्शन से जोड़ दिया है।
20 जुलाई की तारीख क्यों है बेहद अहम? जानिए पूरी रणनीति
आंदोलनकारियों ने संसद मार्च के लिए 20 जुलाई की तारीख को बेहद सोच-समझकर चुना है। दरअसल, इसी दिन से देश की संसद का मानसून सत्र (Monsoon Session) शुरू होने जा रहा है।
वांगचुक की रणनीति बहुत सीधी है। उनका मानना है कि जब देश के सभी सांसद और नीति-निर्माता संसद भवन में मौजूद होंगे, तब वहां तक आवाज पहुंचाना सबसे ज्यादा असरदार होगा। जंतर-मंतर से संसद तक निकलने वाला यह शांतिपूर्ण मार्च देश के कर्णधारों को सीधे तौर पर शिक्षा सुधार और पर्यावरण सुरक्षा पर कड़ा संदेश देने का काम करेगा। हालांकि, इस मार्च के दौरान सुरक्षा से जुड़ी बड़ी व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने आएंगी। चूंकि संसद का इलाका देश के सबसे सुरक्षित क्षेत्रों में आता है और सत्र के पहले दिन सुरक्षा वैसे भी चाक-चौबंद रहती है। ऐसे में दिल्ली पुलिस द्वारा भारी बैरिकेडिंग, अतिरिक्त बल की तैनाती और ट्रैफिक डायवर्जन किया जाना तय है। अगर प्रदर्शनकारी प्रतिबंधित क्षेत्र में घुसने का प्रयास करेंगे, तो पुलिस की तरफ से हिरासत (Detention) जैसी कड़ी कार्रवाई भी देखने को मिल सकती है।
विवादों के बीच CJP को मिली कोर्ट से बड़ी राहत
यह आंदोलन सिर्फ अपनी मांगों को लेकर ही नहीं, बल्कि पिछले कुछ दिनों में कई विवादों की वजह से भी सुर्खियों में बना रहा। प्रदर्शन के दौरान कुछ छात्र नेताओं की तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसी बीच सोशल मीडिया पर सीजेपी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके के कुछ वीडियो वायरल हुए, जिनमें वे खाना खाते हुए दिखाई दे रहे थे। इसके बाद आंदोलन की विश्वसनीयता पर सोशल मीडिया पर कई तरह के सवाल उठाए जाने लगे, जिस पर बाद में उन्होंने अपनी सफाई भी पेश की।
इन विवादों के बीच संगठन को एक बड़ी कानूनी राहत भी मिली है। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीजेपी का ब्लॉक हुआ एक्स (पहले ट्विटर) अकाउंट दोबारा बहाल (Restore) कर दिया गया है। आज के दौर में सोशल मीडिया किसी भी आंदोलन की सबसे मजबूत आवाज होता है। ऐसे में अकाउंट वापस मिलने से इस मुहिम को डिजिटल रूप से एक नया पुश मिला है। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी (AAP), माकपा (CPI-M) और संयुक्त किसान मोर्चा जैसे बड़े संगठनों के नेताओं ने भी जंतर-मंतर पहुंचकर इस आंदोलन को अपना खुला समर्थन दे दिया है।
मानसून सत्र के पहले दिन होगा आंदोलन का ‘अंतिम टेस्ट’
फिलहाल सरकार की तरफ से इस पूरे गतिरोध को लेकर कोई बड़ा नीतिगत बदलाव नहीं दिखाई दिया है। केंद्र सरकार पहले ही नीट मामले की जांच और दोषियों पर कार्रवाई की बात कह चुकी है। हालांकि, प्रदर्शनकारी सिर्फ जांच के आश्वासन से संतुष्ट नहीं हैं; वे शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और पूरे सिस्टम में ढांचागत बदलाव चाहते हैं।
यही वजह है कि 20 जुलाई का प्रस्तावित मार्च इस आंदोलन का अगला सबसे बड़ा चरण माना जा रहा है। राजनीतिक नजरिए से देखें तो अब यह सिर्फ छात्रों का गुस्सा नहीं रह गया है, बल्कि इसमें शासन, पर्यावरण और लद्दाख जैसे कई संवेदनशील राजनीतिक आयाम जुड़ चुके हैं। अगर 20 जुलाई को दिल्ली की सड़कों पर भारी भीड़ जुटती है, तो सरकार पर दबाव बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा और संसद के अंदर विपक्ष भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरेगा। अब पूरे देश की नजरें मानसून सत्र के पहले दिन पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि देश में शिक्षा सुधार और छात्रों को न्याय दिलाने की यह लड़ाई आगे किस दिशा में जाएगी।









