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Manusmriti In NCERT Class 9 New Book: क्या बदल गया 9वीं के बच्चों का इतिहास? जानिए महिलाओं और जाति व्यवस्था पर हुआ नया बदलाव

Manusmriti In NCERT Class 9 New Book

Manusmriti In NCERT Class 9 New Book: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9वीं की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक इन दिनों काफी सुर्खियों में है। किताब के एक नए अध्याय, जिसका शीर्षक है ‘1000 ईस्वी तक राज्य और समाज’, में प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था को लेकर कई बड़े और महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इस अध्याय में न केवल प्राचीन काल में महिलाओं की स्थिति को नए दृष्टिकोण से पेश किया गया है, बल्कि प्रसिद्ध और अक्सर विवादों में रहने वाले संस्कृत ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ के एक श्लोक को भी शामिल किया गया है। आइए इस पूरे बदलाव को डिकोड करते हैं।

मनुस्मृति 3.56 का जिक्र: महिलाओं के सम्मान की परंपरा

मनुस्मृति एक ऐसा प्राचीन ग्रंथ है जो समाज और कानून के नियमों को बताता है, लेकिन जाति और महिलाओं की स्थिति को लेकर इस पर लंबे समय से तीखी बहसें और विवाद होते रहे हैं। हालांकि, NCERT की नई किताब में इसके एक बेहद सकारात्मक श्लोक (मनुस्मृति 3.56) को उद्धृत किया गया है:

“जहां स्त्री-पुरुषों का सम्मान किया जाता है, वहां देवता प्रसन्न होते हैं; जहां उनका सम्मान नहीं किया जाता, वहां सभी पवित्र अनुष्ठान निष्फल हो जाते हैं।”

पाठ्यपुस्तक के अनुसार, यह श्लोक यह दर्शाता है कि वैदिक काल के बाद रचित ग्रंथों में भी महिलाओं के प्रति सम्मान की एक मजबूत और स्पष्ट परंपरा मौजूद थी। Manusmriti In NCERT Class 9 New Book

नई किताब के 3 सबसे बड़े ऐतिहासिक डिकोड

1. वैदिक काल में महिलाओं की सक्रिय और राजसी भूमिका

अध्याय में बताया गया है कि प्राचीन काल में महिलाओं की स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रही। राजनीतिक और सामाजिक बदलावों के कारण समय के साथ इसमें उतार-चढ़ाव और कुछ कालखंडों में गिरावट भी आई, लेकिन वे हर दौर में सक्रिय रहीं:

  • विदुषी महिलाएं: ऋग्वेद के कई भजनों का संबंध अपाला, विश्ववारा, घोषा और लोपामुद्रा जैसी विदुषी महिला ऋषियों से है, जो यह साबित करता है कि उस दौर में महिलाएं उच्च शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करती थीं।
  • शासन और सत्ता: किताब में वाकाटक साम्राज्य की महिला शासक प्रभावती गुप्त का विशेष उदाहरण दिया गया है, जिन्होंने न केवल शासन चलाया बल्कि धार्मिक कार्यों को भी बढ़ावा दिया। इसके अलावा, संगम साहित्य के हवाले से बताया गया है कि महिलाएं खेती, अर्थव्यवस्था और हस्तशिल्प में भी बराबर की भागीदार थीं।

2. जन्म नहीं, ‘कर्म’ आधारित थी शुरुआती पहचान

इस अध्याय का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक पहचान को लेकर है। किताब साफ शब्दों में कहती है कि प्रारंभिक वैदिक ग्रंथों में जन्म के आधार पर निर्धारित किसी निश्चित सामाजिक स्थिति का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।

ऋग्वेद का उदाहरण: किताब में ऋग्वेद के एक प्रसिद्ध भजन का हवाला दिया गया है, जिसमें एक ही परिवार के भीतर व्यावसायिक विविधता को दिखाया गया है—“मैं एक कवि हूँ; मेरे पिता एक चिकित्सक हैं; मेरी माता अनाज पीसने वाली हैं।”

यह उदाहरण छात्रों को यह समझाने के लिए जोड़ा गया है कि प्राचीन भारतीय समाज शुरुआत में योग्यता और काम के आधार पर चलता था, न कि जन्म के आधार पर।

3. वर्ण व्यवस्था: शुरुआत में कठोर श्रेणियां नहीं थीं

पाठ्यपुस्तक के मुताबिक, समाज में चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) की भूमिकाएं शुरुआत में कोई कठोर सामाजिक श्रेणियां नहीं थीं, बल्कि यह केवल कार्यों और जिम्मेदारियों के आधार पर श्रम का बंटवारा था।

  • मूल्यों की प्रणाली: इस व्यवस्था में ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया था, उसके बाद राजनीतिक शक्ति और फिर धन का स्थान आता था।
  • बौद्ध ग्रंथ सुत्त निपाता का प्रमाण: सामाजिक प्रतिष्ठा को पूरी तरह कर्म से जोड़ने के लिए बौद्ध ग्रंथ ‘सुत्त निपाता’ का हवाला देते हुए लिखा गया है—“कोई भी व्यक्ति जन्म से अछूत नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों के कारण होता है। ब्राह्मण भी अपने कर्मों के कारण अछूत बनता है।”

किताब के अंत में समझाया गया है कि जैसे-जैसे समय बदला, अलग-अलग समुदायों के बीच विवाह संबंध बने और नए व्यवसाय विकसित हुए, वैसे-वैसे वर्णों से ‘जातियों’ का जन्म हुआ, जिनकी संख्या लगातार बढ़ती चली गई।

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