West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) में बड़ी टूट की खबरें तेज हो गई हैं, जहां पार्टी से निष्कासित विधायकों के नेतृत्व में बागी गुट के नेता विधानसभा स्पीकर से मिलने पहुंचे हैं। हाल ही में टीएमसी से निष्कासित किए गए दो विधायकों, ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने बुधवार सुबह विधानसभा पहुंचकर स्पीकर के सामने 59 विधायकों के समर्थन का दावा पेश करने की तैयारी की है।
यह पूरा विवाद 2026 विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार के बाद शुरू हुआ। विधानसभा में नेता विपक्ष और चीफ व्हिप की नियुक्ति के लिए सौंपे गए दस्तावेज़ों पर बागी विधायकों ने फर्जी हस्ताक्षर (Signature Forgery) होने का आरोप लगाया था। विवाद बढ़ने पर ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई एक महत्वपूर्ण बैठक में कुल 80 विधायकों में से लगभग 60 विधायक गायब रहे, जिसके बाद ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था।
West Bengal Politics: बागी नेता विधानसभा स्पीकर के सामने प्रमुख रूप से उठा रहे हैं ये तीन मुद्दे
- असली TMC का दावा: उनके पास विधायकों का पूर्ण बहुमत है, इसलिए वे ही असली तृणमूल कांग्रेस हैं।
- नेता विपक्ष की दावेदारी: शोभनदेव चट्टोपाध्याय की जगह ऋतब्रत बनर्जी को नया नेता विपक्ष चुना जाए।
- पार्टी सिंबल पर हक: दो-तिहाई से अधिक बहुमत होने के कारण चुनावी चिह्न पर उनका अधिकार होना चाहिए।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में TMC के कुल 80 विधायक हैं। दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी भी नए गुट को बिना सदस्यता गंवाए मान्यता प्राप्त करने के लिए दो-तिहाई यानी कम से कम 54 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। बागी गुट का दावा है कि उनके साथ 50 से अधिक (लगभग 60) विधायक हैं, जिससे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली मूल पार्टी के सामने अपनी पहचान बचाने का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। (West Bengal Politics)
साइनगेट विवाद से बढ़ी टीएमसी की मुश्किलें
निलंबित टीएमसी नेता रिजु दत्ता द्वारा मंगलवार को दिए गए बयान ने भाजपा के हाथों करारी हार झेलने के कुछ हफ्तों बाद टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और बंगाल में उनकी पार्टी के भविष्य को लेकर नया सस्पेंस पैदा कर दिया है। सीआईडी जांच को शुरू करने वाले चल रहे हस्ताक्षर कांड या साइनगेट के बारे में विस्तार से बताते हुए, दत्ता ने तृणमूल से निष्कासित दो विधायकों, ऋतब्रता बंदोपाध्याय और संदीपान साहा के बारे में बात की, जिन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में प्रस्तुत दस्तावेजों में उनके हस्ताक्षर जाली थे। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी के कुछ नेता आज दोपहर विधानसभा अध्यक्ष से मिलकर अपनी समस्याओं को उठाएंगे। (West Bengal Politics)
दो-तिहाई बहुमत के दावे के साथ महाराष्ट्र मॉडल की चर्चा तेज
रिजू दत्ता ने दावा किया कि बंगाल में ‘महाराष्ट्र मॉडल’ लागू है और लगभग 50 विधायक एकजुट होकर दो-तिहाई बहुमत बना चुके हैं।उन्होंने कहा, ‘हमारे पास दो-तिहाई बहुमत है। लगभग 50 विधायक हमारे साथ हैं। चूंकि हम असली तृणमूल कांग्रेस हैं, इसलिए विपक्ष के नेता ऋतब्रता बंदोपाध्याय होंगे, न कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय।’ उन्होंने आगे कहा कि चूंकि बहुमत इन्हीं विधायकों के पास है, इसलिए उन्हें पार्टी चिन्ह भी रखने की अनुमति दी जानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि शिव सेना महाराष्ट्र मॉडल वर्तमान में बंगाल में लागू है।
दत्ता 2022 में शिवसेना के दो गुटों में विभाजन का जिक्र कर रहे थे, जिसके बाद उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार महाराष्ट्र में सत्ता से बेदखल हो गई थी। उस समय भी पार्टी के नाम और चिन्ह को लेकर विवाद छिड़ा था, जो आखिर में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट के पक्ष में गया, क्योंकि राज्य विधानसभा में उनके विधायकों का बहुमत था। हालांकि, ममता बनर्जी अपनी पार्टी के आंतरिक संकट से निपटने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं और उन्होंने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी पर हुए कथित हमले के विरोध में मंगलवार को राज्य में एक विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई। (West Bengal Politics)
निष्कासन के बाद बागी विधायकों का शक्ति प्रदर्शन
रिजू दत्ता की टिप्पणियां तृणमूल कांग्रेस के भीतर सार्वजनिक रूप से चल रही दरार का पहला संकेत नहीं हैं। सोमवार को पार्टी ने संदीपान साहा और ऋतब्रता बनर्जी को निष्कासित कर दिया, क्योंकि पार्टी के 80 विधायकों में से 61 ने महत्वपूर्ण बैठकों में भाग नहीं लिया था। इन विधायकों पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का भी आरोप लगाया गया था। हालांकि, इन निष्कासनों के समय पर सवाल उठे, क्योंकि ये विधायकों द्वारा सार्वजनिक रूप से जाली हस्ताक्षरों पर सवाल उठाने के लगभग तुरंत बाद हुए।
यह घोटाला पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता और पार्टी के मुख्य सचेतक की नियुक्ति से संबंधित दस्तावेजों से जुड़ा है, जो 2026 के चुनावों के बाद प्रस्तुत किए गए थे, जिनमें टीएमसी हार गई थी। अब यह देखना बाकी है कि बंगाल में इस दरार का क्या नतीजा निकलता है, जहां कई पार्टी नेता जांच के दायरे में हैं और कथित घोटाले की सीआईडी जांच चल रही है। (West Bengal Politics)
संविधान और दलबदल कानून की कसौटी पर टीएमसी का सियासी संग्राम (West Bengal Politics)
अगर किसी राष्ट्रीय/राज्य स्तर की पार्टी के विधायक बागी हो जाएं, तो वे सीधे पार्टी पर दावा नहीं कर सकते। यह मामला मुख्य रूप से दसवीं अनुसूची में दिए दलबदल कानून, पार्टी संगठन के संविधान और निर्वाचन आयोग के नियमों से तय होता है। 91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद कम से कम दो-तिहाई विधायक मूल पार्टी से अलग होने का निर्णय लेते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से छूट मिल सकती है। इसके बाद चुनाव आयोग यह जांच करता है कि पार्टी पर असली नियंत्रण किसका होगा। इसके लिए 4 पॉइंट तय हैं…
- पार्टी संगठन किसके साथ है?
- राष्ट्रीय/राज्य कार्यकारिणी किसके साथ है?
- पार्टी संविधान क्या कहता है?
- चुने हुए प्रतिनिधियों का समर्थन किसे है?









