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अरावली विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले पर लगाई रोक, इस तारीख को होगी अगली सुनवाई

देश में आये दिन कोई न कोई नया विवाद खड़ा हो जाता है। बता दें कि ये कोई राजनीतिक विवाद नहीं है। लेकिन फिर भी इसको राजनीतिक रंग देने की पूरी कोशिश की जा रही है। दरअसल देश में अरावली पहाड़ियों को बचाने को लेकर एक नई बहस छिड़ चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया एक फैसले के बाद यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। कोर्ट ने कहा है कि अरावली क्षेत्र में 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को जंगल के रूप में मान्यता नहीं दी जाएगी। हालांकि इस आदेश के सामने आते ही पर्यावरण विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर भी बड़ी संख्या में युवा ‘सेव अरावली’ को लेकर अभियान चला रहे हैं। इन सबके बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को सामने आकर पीसी करनी पड़ी और सारी बातों को पूरी तरह से क्लीयर करना पड़ा, जो भी अरावली को लेकर जनता और राजनीतिक पार्टियों में भ्रम था।

अपने ही फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक

अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने 20 नवंबर वाले फैसले पर स्टे लगा दिया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी सुनवाई के दौरान कुछ सवाल पूछे हैं। कहा गया है कि सरकार स्पष्ट बताए कि अरावली में खनन जारी रहेगी या उस पर रोक लगेगी। इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होनी है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान अरावली को लेकर बनाई गई कमेटी की तमाम सिफारिशों पर भी अभी के लिए रोक लगा दी है। इसके अलावा केंद्र सरकार और राज्य सरकार को नोटिस भी जारी किया गया है। इस मामले में अब अदालत ने हाई लेवल कमेटी बनाने के निर्देश दे दिए हैं।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ

आइये आज आपको “ऑफ द रिकॉर्ड” कोर्ट के अंदर क्या हुआ बताते हैं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत के किसी भी आदेश या रिपोर्ट को लागू करने से पहले एक निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है। अदालत ने यह भी प्रस्ताव रखा कि एक हाई पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी गठित की जाए, जो पूरे मामले की गहराई से और समग्र तरीके से जांच करे। ताकि इस कमेटी में केवल अधिकारी नहीं, बल्कि विषय से जुड़े विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम इस बात पर ध्यान देना चाहते हैं कि क्या अरावली की परिभाषा को सिर्फ 500 मीटर तक सीमित करना एक संरचनात्मक विरोधाभास पैदा करता है, जिससे संरक्षण क्षेत्र और संकुचित हो जाता है.” अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि क्या इससे गैर-अरावली क्षेत्रों का दायरा बढ़ गया है, जहां नियंत्रित खनन की अनुमति दी जा सकती है।

कोर् ने केंद्र और चार राज्यों को जारी की नोटिस

कोर्ट ने केंद्र और चार अरावली राज्यों (राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा) को भी नोटिस जारी किया है, और इस मुद्दे पर उनका जवाब मांगा है। अरावली पर्वत श्रंखला इन्हीं चार राज्यों में स्थित है। इस पर्वत श्रंखला का एक छोर गुजरात और दूसरा छोर दिल्ली में है। इसका बड़ा हिस्सा राजस्थान में है। हरियाणा में भी इस पर्वत श्रंखला का बड़ा हिस्सा है। अरावली के पर्वत हिमालय की तरह ज्यादा ऊंचे नहीं हैं, लेकिन कई तरह के वन्य जीव और पेड़ यहां पाए जाते हैं। यहां खनन शुरू होने पर इन वन्य जीवों और पेड़ों को खतरा हो सकता है।

अरावली का पूरा विवाद क्या है?

असल में, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में अरावली क्षेत्र की लगभग 10 हजार पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा बताया था। साथ ही यह सिफारिश भी की गई थी कि इन इलाकों में खनन गतिविधियों पर रोक लगाई जानी चाहिए। इस रिपोर्ट के बाद राजस्थान की भजनलाल शर्मा की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और राज्य सरकार ने दलील ये दी कि यदि इस रिपोर्ट को पूरी तरह लागू किया गया, तो प्रदेश में चल रही अधिकतर खनन गतिविधियां बंद हो जाएंगी। राज्य सरकार के तर्क सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पूरे मामले में नए सिरे से कानून बनाने की जरूरत है, और तब तक पुरानी व्यवस्थाओं को बनाए रखा जा सकता है।

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