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ट्रंप का ‘ग्रीनलैंड’ दांव! डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने जताई चिंता, $600 अरब के टैरिफ फायदे का भी दावा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए हालिया बयान ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल पैदा कर दी है। जहां एक ओर डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने ट्रंप के इस प्रस्ताव को ‘गंभीरता’ से लेने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने अपनी नई व्यापार नीति के जरिए अमेरिकी खजाने में $600 अरब जोड़ने का बड़ा दावा किया है।

आपको बताते चलें कि डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को हासिल करने की अमेरिकी इच्छा को दोहराया है। हालांकि, अतीत में इसे एक ‘मजाक’ या ‘अवास्तविक’ विचार मानकर खारिज कर दिया गया था, लेकिन डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन का ताजा बयान संकेत देता है कि इस बार स्थिति अलग हो सकती है। प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने कहा कि ट्रंप के इस बयान को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता और इसके कूटनीतिक निहितार्थों पर चर्चा की जरूरत है। हालांकि, डेनमार्क ने पहले भी स्पष्ट किया है कि “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है,” लेकिन ट्रंप का इस मुद्दे को बार-बार उठाना आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ती रणनीतिक रुचि को दर्शाता है।

ग्रीनलैंड विवाद के बीच, ट्रंप ने अपनी आर्थिक रणनीति पर भी बड़ा बयान दिया है। उन्होंने दावा किया है कि उनके द्वारा लगाए गए नए और आक्रामक टैरिफ (आयात शुल्क) से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को $600 अरब (लगभग 50 लाख करोड़ रुपये) का सीधा फायदा होगा।

ट्रंप का मानना है कि विदेशी वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाने से न केवल घरेलू उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि इससे होने वाली कमाई से अमेरिकी कर्ज को कम किया जा सकेगा। यदि विशेषज्ञ कि माने तो उन्होंने चेतावनी दी है कि इतने बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाने से वैश्विक ‘ट्रेड वॉर’ छिड़ सकता है, जिससे अन्य देशों के साथ अमेरिका के संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि यह राशि देश के बुनियादी ढांचे और रक्षा क्षेत्र में निवेश की जाएगी।

यूरोपीय संघ और नाटो (NATO) के सदस्य देश इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रख रहे हैं। जानकारों का कहना है कि ग्रीनलैंड केवल एक द्वीप नहीं है, बल्कि यह संसाधनों और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। रूस और चीन की आर्कटिक में बढ़ती सक्रियता को देखते हुए ट्रंप इसे अमेरिका के लिए एक ‘सुरक्षा कवच’ की तरह देख रहे हैं।

​दूसरी ओर, $600 अरब के टैरिफ वाले दावे ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा कर दी है। यदि अमेरिका इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो भारत समेत कई प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को अपनी निर्यात रणनीतियों पर पुनर्विचार करना होगा।

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