लखनऊ डेस्क: उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों हलचल तेज है। जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रात के अंधेरे में बिना किसी आधिकारिक तामझाम के निराला नगर स्थित संघ कार्यालय पहुँचते हैं और संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ पूरे 35 मिनट तक बंद कमरे में चर्चा करते हैं, तो यह मान लेना कि यह केवल एक ‘शिष्टाचार भेंट’ है, राजनीतिक भूल होगी। अगले ही दिन दोनों उपमुख्यमंत्री—केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक—का भी उसी चौखट पर हाजिरी लगाना इस बात की पुष्टि करता है कि लखनऊ से दिल्ली तक 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए किसी बड़े ‘ऑपरेशन’ की पटकथा लिखी जा रही है।
कैबिनेट विस्तार और संगठन की ‘ओवरहॉलिंग’
राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा मंत्रिमंडल विस्तार (Cabinet Expansion) को लेकर है। माना जा रहा है कि संघ प्रमुख का यूपी पर बढ़ता फोकस इस बात का संकेत है कि अब चेहरों का चयन केवल चुनावी समीकरणों पर नहीं, बल्कि ग्राउंड फीडबैक और संघ की विचारधारा के प्रति समर्पण के आधार पर होगा।
- सत्ता का संतुलन: मुख्यमंत्री और दोनों डिप्टी सीएम की अलग-अलग मुलाकातों का उद्देश्य सरकार के भीतर ‘ऑल इज वेल’ का संदेश देना और आपसी तालमेल (Coordination) को मजबूत करना है।
- संगठन में जान फूंकना: लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कार्यकर्ताओं और प्रशासन के बीच जिस ‘गैप’ को उजागर किया था, संघ अब उसे भरने की तैयारी में है। संघ चाहता है कि बीजेपी अपने उस पुराने ‘कैडर बेस’ को फिर से सक्रिय करे, जो बूथ मैनेजमेंट में माहिर माना जाता है।
2027 का ब्लूप्रिंट: विपक्ष के ‘PDA’ काट की तलाश
विपक्ष जिस तरह से ‘संविधान’ और ‘जाति’ के मुद्दे को हवा देकर ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला सेट कर रहा है, संघ प्रमुख की रणनीतिक सक्रियता उसी की काट खोजने के लिए है।
- सोशल इंजीनियरिंग: संघ चाहता है कि सरकार की योजनाओं का लाभ सीधे तौर पर पिछड़ों और दलितों तक पहुँचे, ताकि ‘समरसता’ केवल नारों में नहीं बल्कि वोटों में भी दिखे।
- रणनीतिकार की भूमिका: अब संघ केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि एक रणनीतिकार की भूमिका में है। मोहन भागवत का बार-बार यूपी दौरा यह साबित करता है कि 2027 की हार का जोखिम संघ किसी भी कीमत पर नहीं उठाना चाहता, क्योंकि इसका सीधा असर 2029 के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा।
ब्यूरोक्रेसी और गवर्नेंस का नया मॉडल
इस मंथन का एक पहलू सरकार की छवि को ‘डिलीवरी’ वाली बनाए रखना भी है। सड़कों का हाल, बिजली बिल, किसानों की समस्याएं और युवाओं के रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर संघ का जोर है कि सरकार की कार्यप्रणाली में संवेदनशीलता दिखे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संघ के साथ यह बढ़ता समन्वय बताता है कि वे अपने कड़े प्रशासन की छवि के साथ-साथ संगठन के विश्वास को भी और ज्यादा पुख्ता करना चाहते हैं।
वेट एंड वॉच’ का समय खत्म
(मोहन भागवत) निराला नगर के सरस्वती शिशु मंदिर में हुई यह बातचीत यूपी की सत्ता के भविष्य का एक ‘वर्किंग ड्राफ्ट’ है। अब बारी ‘एक्शन’ की है—चाहे वह मंत्रिमंडल में बदलाव हो, संगठन में नई नियुक्तियां हों या जिलों के प्रभारियों का चयन। संघ अब यूपी में ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ की तरफ बढ़ रहा है। सवाल अब भी वही है कि क्या चेहरों को बदलने और संघ की सक्रियता से जनता का मिजाज बदला जा सकता है? क्या यह मंथन विपक्ष की सोशल इंजीनियरिंग को मात दे पाएगा?









