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 विपक्ष भी करता था सलाम, क्यों हर सरकार की जरूरत बने रहे अजित पवार?

राजनीति में चेहरे बदलते हैं, गठबंधन टूटते हैं और सत्ता आती-जाती रहती है। लेकिन कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जिनकी पहचान कुर्सी से नहीं, बल्कि उनके काम करने के अंदाज से होती है। महाराष्ट्र की राजनीति के ‘अजित दादा’ यानी अजित पवार एक ऐसा ही नाम थे। उनके आकस्मिक निधन ने न केवल एक राजनीतिक शून्यता पैदा की है, बल्कि उस प्रशासनिक ढांचे को भी हिला दिया है जिसे उन्होंने दशकों तक अपने कड़क अनुशासन से सींचा था। आज ‘प्रशासन का शेर’ शांत हो गया है, लेकिन उनकी कार्यशैली की गूंज हमेशा बनी रहेगी।

शुरुआती सफर: जमीन से जुड़ी राजनीति

22 जुलाई 1959 को जन्मे अजित दादा के रगों में राजनीति विरासत के रूप में दौड़ती थी। शरद पवार साहब के भतीजे होने के नाते उनके लिए राहें आसान हो सकती थीं, लेकिन उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना। सहकारी संस्थाओं और जमीनी स्तर पर किसानों के बीच काम करते हुए उन्होंने ‘Ground Reality’ को समझा। बारामती से 8 बार विधायक चुना जाना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि उस अटूट भरोसे का नतीजा है जो उन्होंने हर सुबह 6 बजे जागकर जनता की समस्याओं को सुनकर कमाया था।

अनुशासन के पर्याय: जब घड़ियाँ दादा के समय से मिलती थीं

अगर अजित पवार को एक शब्द में समेटना हो, तो वह है— ‘अनुशासन’। महाराष्ट्र के मंत्रालय (Secretariat) में यह मशहूर था कि अधिकारी अपनी घड़ियाँ दादा के आने के समय से मिलाते थे।

  • वक्त के पाबंद: अगर मीटिंग सुबह 7 बजे तय है, तो उसका मतलब 7 ही होता था।
  • अतुलनीय याददाश्त: उन्हें फाइलों का नंबर, पेजों की संख्या और बजट का एक-एक आंकड़ा जुबानी याद रहता था।
  • लालफीताशाही का अंत: उनका स्टाइल सरल था— “फाइल जायज है, तो साइन करो और काम शुरू करो।” बड़े-बड़े IAS अधिकारी भी उनके सामने जाने से पहले अपनी पूरी तैयारी करके जाते थे।

किंगमेकर और साहसी फैसले: 2023 का वो मोड़

अजित दादा राजनीति की संभावनाओं के सबसे बड़े खिलाड़ी थे। 6 बार उपमुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेना उनके ‘Political Weight’ को साबित करता है। 2023 में शरद पवार साहब से अलग होकर भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल होने का उनका फैसला उनके जीवन का सबसे कठिन और साहसी कदम था। आलोचकों ने उन्हें ‘बागी’ कहा, लेकिन उन्होंने साफ शब्दों में जवाब दिया— “मुझे विकास करना है, और सत्ता के बिना विकास की गति धीमी पड़ जाती है।” उन्होंने खुद को किसी नैरेटिव से नहीं, बल्कि अपने काम से साबित किया।

स्पष्टवादिता और कार्यकर्ताओं के ‘दादा’

अजित दादा ने कभी ‘डिप्लोमेसी’ का सहारा नहीं लिया। जो गलत था, वो उन्होंने मुंह पर कहा, चाहे सामने कोई भी हो। उनकी इसी साफगोई के प्रशंसक विपक्ष में भी थे। धनंजय मुंडे जैसे नेताओं का उनके प्रति लगाव सत्ता के कारण नहीं, बल्कि उस सम्मान के कारण था जो दादा अपने कार्यकर्ताओं को देते थे। वे कभी किसी कार्यकर्ता का फोन इग्नोर नहीं करते थे, क्योंकि वे जानते थे कि फोन करने वाला वाकई किसी मुसीबत में होगा।

एक युग का अंत: क्या छोड़ गए पीछे?

अजित दादा की विरासत आज महाराष्ट्र की उन नहरों में है जो खेतों तक पानी पहुँचाती हैं, बारामती की उन सड़कों में है जिन्हें उन्होंने एक वैश्विक मॉडल बनाया, और उस प्रशासनिक अनुशासन में है जो उन्होंने व्यवस्था को सिखाया।

प्रधानमंत्री मोदी से लेकर प्रियंका गांधी तक, हर किसी ने माना कि महाराष्ट्र ने एक ऐसा ‘लोकनेता’ खो दिया है जिसकी प्रशासनिक समझ बेमिसाल थी। महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ बहुत होंगे, लेकिन ‘अजित दादा’ जैसा दूसरा कोई नहीं होगा।

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