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Shiv Sena UBT Controversy: शिवसेना में एक और बड़ी टूट की आहट: ‘ऑपरेशन टाइगर’ से हिली उद्धव ठाकरे की जमीन! एकनाथ शिंदे के साथ जा सकते हैं कई सांसद

Shiv Sena UBT Controversy

Shiv Sena UBT Controversy: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना और बड़ा सवाल गूंजने लगा है। दरअसल, साल 2022 के सियासी ड्रामे के बाद क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) एक और बड़ी बगावत का सामना करने जा रही है? पिछले कुछ दिनों से जिस तथाकथित “ऑपरेशन टाइगर” की चर्चा राजनीतिक गलियारों में हो रही थी, अब उसके जमीनी नतीजे सामने आते दिखाई दे रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उद्धव गुट के कई लोकसभा सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपना लिया है। वे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली मूल शिवसेना के साथ जाने की तैयारी में हैं।

विरासत और विचारधारा की लड़ाई: संख्याओं के खेल से बड़ा संकट

अगर इस पूरे घटनाक्रम को केवल सांसदों के पाला बदलने की सामान्य घटना मान लिया जाए, तो यह विश्लेषण अधूरा होगा। असल में, यह बगावत उद्धव ठाकरे के उस नैरेटिव के लिए सबसे बड़ी चुनौती है, जिसके सहारे वे पिछले तीन साल से राजनीति कर रहे हैं।

  • विरासत पर संघर्ष: साल 2022 में जब एकनाथ शिंदे ने बगावत की थी, तब शिवसेना की पहचान, चुनाव चिन्ह और राजनीतिक विरासत को लेकर एक लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई थी।
  • असली शिवसेना कौन?: उस समय उद्धव ठाकरे ने खुद को बालासाहेब ठाकरे की विरासत का इकलौता उत्तराधिकारी बताया था। वहीं, शिंदे गुट का दावा था कि वे बालासाहेब की मूल विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं।
  • नैरेटिव को झटका: अब यदि लोकसभा स्तर पर भी बड़ी संख्या में सांसद उद्धव का साथ छोड़ते हैं, तो जनता के बीच उनका यह दावा कमजोर पड़ सकता है। Shiv Sena UBT Controversy

दलबदल विरोधी कानून और दो-तिहाई का जादुई गणित

भारतीय राजनीति में जब भी कोई बड़ी बगावत होती है, तो सबसे बड़ा संकट सांसदों या विधायकों की सदस्यता पर मंडराता है। यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम को बेहद सोची-समझी कानूनी रणनीति के तहत अंजाम दिया जा रहा है।

क्या कहता है कानून?: संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के मुताबिक, यदि किसी संसदीय दल के दो-तिहाई (2/3) सदस्य एक साथ अलग होते हैं और किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उनकी सदस्यता बची रहती है। सूत्रों की मानें तो बागी गुट इसी कानूनी नंबर गेम को पूरा करने के बाद ही आधिकारिक ऐलान करने की योजना बना रहा है। Shiv Sena UBT Controversy

BMC पर कब्जा करने की जंग: कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा असर

संसद के अलावा इस लड़ाई का एक और सबसे बड़ा केंद्र मुंबई महानगरपालिका (BMC) है। दशकों से बीएमसी पर शिवसेना का एकछत्र राज रहा है। बालासाहेब के दौर से लेकर अब तक बीएमसी ही शिवसेना की वित्तीय और राजनीतिक ताकत का मुख्य प्रतीक रही है।

अगर सांसदों के बाद स्थानीय स्तर पर पूर्व पार्षदों और संगठन के पदाधिकारियों का पलायन शुरू होता है, तो इसका मनोवैज्ञानिक असर बेहद घातक होगा। जब जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को लगता है कि शीर्ष नेतृत्व कमजोर पड़ रहा है, तब संगठन के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा हो जाती है। Shiv Sena UBT Controversy

महायुति बनाम महाविकास अघाड़ी: दिल्ली तक दिखेगा असर

एकनाथ शिंदे और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए यह घटनाक्रम रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

गठबंधन का नामराजनीतिक स्थिति और रणनीति
महायुति (BJP + शिंदे + अजित पवार)विपक्ष के सबसे मजबूत क्षेत्रीय स्तंभ को कमजोर करके आगामी चुनावों की राह आसान करना।
महाविकास अघाड़ी (MVA)शिवसेना (UBT) के कमजोर होने से कांग्रेस और शरद पवार गुट के पूरे विपक्षी ढांचे पर सीधा असर पड़ेगा।

संसद के भीतर क्षेत्रीय दलों की मजबूती ही विपक्ष की सामूहिक शक्ति को तय करती है। ऐसे में अगर उद्धव गुट के सांसद सत्ता पक्ष के पाले में जाते हैं, तो दिल्ली की राजनीति में भी विपक्ष का ग्राफ नीचे आएगा। Shiv Sena UBT Controversy

क्या संकट को ‘सहानुभूति’ में बदल पाएंगे उद्धव?

हालांकि, इतिहास गवाह है कि हर राजनीतिक बगावत हमेशा पूरी तरह सफल नहीं होती। साल 2022 की टूट के बाद उद्धव ठाकरे को जनता से सहानुभूति की एक बड़ी राजनीतिक पूंजी मिली थी। लोकसभा चुनाव में महाविकास अघाड़ी के अच्छे प्रदर्शन के पीछे भी इसी सहानुभूति और बीजेपी विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण माना गया था।

महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। जनता के सामने दो अलग-अलग कहानियां हैं—एक तरफ शिंदे गुट इसे विचारधारा की वापसी बता रहा है, तो दूसरी तरफ उद्धव गुट इसे अवसरवादी राजनीति का नाम दे रहा है। आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि महाराष्ट्र की जनता असली ठाकरे और असली शिवसेना किसे मानती है। Shiv Sena UBT Controversy

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