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‘कांग्रेस का काला अध्याय’! निशिकांत दुबे ने 1964 के केशव सिंह केस का जिक्र कर नेहरू पर साधा निशाना

Nishikant Dubey

Nishikant Dubey: भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने 1964 के प्रसिद्ध केशव सिंह मामले का जिक्र करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इस घटना को ‘कांग्रेस का काला अध्याय’ बताया और कहा कि इसने भारत के संवैधानिक ढांचे पर एक गहरा धब्बा लगाया था। निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट शेयर की, जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा और इलाहाबाद हाई कोर्ट के बीच हुए इस ऐतिहासिक विवाद की पूरी कहानी बताई।

Nishikant Dubey: क्या था 1964 का केशव सिंह मामला?

निशिकांत दुबे (Nishikant Dubey) के अनुसार, यह विवाद मार्च 1964 में शुरू हुआ जब उत्तर प्रदेश विधानसभा ने विशेषाधिकार कार्यवाही के तहत केशव सिंह नाम के एक व्यक्ति को जेल भेज दिया। हालांकि, स्थिति तब और बिगड़ गई जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति जी.डी. सहगल और न्यायमूर्ति एन.यू. बेग ने विधानसभा के फैसले पर रोक लगा दी। इन न्यायाधीशों के फैसले के विरोध में विधानसभा ने दोनों न्यायाधीशों और केशव सिंह के वकील सोलोमन को जेल भेजने का आदेश दिया, जिससे हंगामा मच गया और ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को कारावास का सामना करना पड़ा।

भाजपा नेता ने आगे दावा किया कि विधानसभा के इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ, यानी 28 न्यायाधीशों की पीठ गठित की गई। इसने न केवल फैसले पर रोक लगाई बल्कि मुख्यमंत्री के साथ विधानसभा अध्यक्ष को भी जेल भेजने का आदेश दिया। यह सब प्रधानमंत्री नेहरू जी के आदेश पर हुआ। दुबे (Nishikant Dubey) ने आगे कहा कि विधानसभा सभी न्यायाधीशों को जेल भेजने पर आमादा थी, तभी तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय से राय मांगी, जिसकी सुनवाई उसी दिन, 19 जून 1964 को मुख्य न्यायाधीश गजेंद्रगडकर जी के नेतृत्व में संवैधानिक पीठ द्वारा शुरू हुई।

दुबे (Nishikant Dubey) ने बताया कि गजेंद्रगडकर जी को सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश को मानसिक रूप से बीमार घोषित करने के बाद मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। यह फैसला सितंबर 1964 में आया था, जिसमें न्यायपालिका के हस्तक्षेप पर रोक लगाते हुए स्पीकर की शक्तियों को सर्वोच्च माना गया था। नेहरू जी के वंशज राहुल गांधी जी को यह जानकारी कपिल सिबल जी के साथ साझा करनी चाहिए। भाजपा सांसद ने इस ऐतिहासिक घटना को याद दिलाते हुए कांग्रेस पर देश की संवैधानिक संस्थाओं के अपमान और तानाशाही रवैये का आरोप लगाया है।

‘माउंटबेटन-नेहरू-जिन्ना समझौते’ को लेकर Nishikant Dubey के विवादित आरोप

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भाजपा नेता (Nishikant Dubey) ने कांग्रेस पर हमला करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया है। इससे पहले, दुबे ने 3 जून, 1947 की विभाजन योजना को “माउंटबेटन- नेहरू – जिन्ना समझौता” बताया था और इसे जम्मू और कश्मीर में उत्पन्न समस्याओं का कारण बताया था। एक्स पर एक पोस्ट में, दुबे ने कहा, “3 जून, 1947 को-ठीक इसी दिन – माउंटबेटन ने दिल्ली में भारत और पाकिस्तान नामक दो देशों के निर्माण की घोषणा की थी। नेहरू जी के दुराचार की नींव पर की गई यह घोषणा विश्व इतिहास की सबसे शर्मनाक घटनाओं में से एक है। इसकी नींव 10-12 मई को शिमला में रखी गई थी, जहाँ लेडी माउंटबेटन के प्रेम में अंधे नेहरू जी ने इसकी नींव रखी थी। शिमला की इस तस्वीर को देखकर कोई भी भारत के विभाजन के मूल कारण को समझ सकता है। 3 जून, 1947 की इसी घोषणा ने कश्मीर की समस्याओं के बीज बोए थे।”

निशिकांत दुबे (Nishikant Dubey) ने आगे कहा, “माउंटबेटन – नेहरू – जिन्ना समझौते में माउंटबेटन ने कश्मीर को अलग रखा। यह एक ऐसी समस्या है जिससे भारत आज तक जूझ रहा है। महात्मा गांधी जी को नजरबंद कर दिया गया था, और यह विभाजन उनकी सहमति या जानकारी के बिना किया गया था। कांग्रेस, जिसने गांधी जी को उनके जीवनकाल में ही मार डाला, ने 3 जून, 1947 को अन्ना हजारे जी या केजरीवाल जी के समान ही कृत्य किया। सही मायने में, नेहरू-गांधी परिवार ही गद्दार, धोखेबाज और राष्ट्रद्रोही कहलाने का हकदार है।”

ऐसा पहली बार नहीं है कि निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी, कांग्रेस और पंडित जवाहर लाल नेहरू पर पहली बार निशाना साधा है। निशिकांत दुबे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर लगातार हमलावर रहे हैं।


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