by-Vaishali
Govardhan Asrani: बॉलीवुड के चर्चित अभिनेता और हास्य कलाकारों में से एक गोवर्धन असरानी जिन्हें प्यार से असरानी के नाम से जाना जाता था सोमवार को इस दुनिया को अलविदा कह गए। लंबी बीमारी के बाद 20 अक्टूबर 2025 को एक्टर का 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से बॉलीवुड में शोक की लहर है।
पांच दशकों से अधिक समय तक हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाए रखने वाले असरानी ने निश्चित रूप से हंसी और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग पर आधारित एक अपूरणीय विरासत छोड़ी है।

असरानी का अंतिम सफर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, गोवर्धन असरानी (Govardhan Asrani) के फेफड़ों में पानी भर जाने से उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। उनके मैनेजर बाबू भाई थीबा ने एएनआई को बताया कि दिग्गज अभिनेता ने दोपहर 3 बजे जुहू स्थित आरोग्य निधि अस्पताल में अंतिम सांस ली। उसी शाम 8 बजे सांताक्रूज़ श्मशान घाट पर विद्युत शवदाह विधि से उनका अंतिम संस्कार किया गया।

जयपुर से बॉलीवुड तक: असरानी की प्रेरणादायक यात्रा
1 जनवरी, 1940 को जयपुर में जन्मे असरानी एक मध्यमवर्गीय सिंधी परिवार में पले-बढ़े। उनके पिता कालीन का व्यवसाय करते थे, लेकिन युवा गोवर्धन की व्यापार में कोई रुचि नहीं थी। इसके बजाय, उन्होंने प्रदर्शन कलाओं में अपना ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और बाद में राजस्थान कॉलेज से स्नातक की उपाधि हासिल की, साथ ही जयपुर में एक वॉइस आर्टिस्ट के रूप में काम करके अपना खर्च चलाया।

करियर की शुरुआत: ‘हरे कांच की चूड़ियाँ’ से पहली पहचान
कॉलेज के दिनों में ही असरानी (Govardhan Asrani) का अभिनय के प्रति आकर्षण आकार लेने लगा था। 1960 से 1962 तक उन्होंने ‘साहित्य कलाभाई ठक्कर’ से प्रशिक्षण लिया और 1964 में पुणे स्थित भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (FTII) में दाखिला लिया। इस फैसले ने जल्द ही उनके जीवन की दिशा तय कर दी।
असरानी ने 1967 में ‘हरे कांच की चूड़ियाँ’ से अपने करियर की शुरुआत की, जहाँ उन्होंने अभिनेता बिस्वजीत के दोस्त की भूमिका निभाई। हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाने से पहले, उन्होंने कई गुजराती फिल्मों में मुख्य अभिनेता के रूप में काम किया।
इसके बाद उनका करियर ऐसा रहा जिसकी बराबरी बॉलीवुड के इतिहास में कम ही कर पाते हैं। विभिन्न शैलियों, पीढ़ियों और युगों में 350 से ज़्यादा फ़िल्में। हालाँकि वे गंभीर और सहायक भूमिकाएँ समान रूप से सहजता से निभा सकते थे, लेकिन उनकी हास्य शैली ने उन्हें प्रशंसकों का पसंदीदा बना दिया।
1970 से 1990 के दशक तक, असरानी बड़े पर्दे पर एक जाना-पहचाना चेहरा थे, एक ऐसे अभिनेता जो छोटे से दृश्य को भी प्रभावशाली बना सकते थे। राजेश खन्ना के साथ उनकी जोड़ी बॉलीवुड की सबसे सफल फिल्मों में से एक है, और दोनों ने 1972 से 1991 के बीच 25 से ज़्यादा फिल्मों में साथ काम किया।

क्लासिक भूमिकाएँ: ‘शोले’ में असरानी की अमर भूमिका
असरानी (Govardhan Asrani) के कई यादगार प्रदर्शनों में ‘चुपके-चुपके,’ ‘छोटी सी बात,’ ‘रफू चक्कर,’ ‘बावर्ची,’ ‘कोशिश,’ और ‘मेरे अपने’ जैसी फिल्में शामिल हैं, जिन्हें आज भी देखना उतना ही आनंददायक है, जितना पहली बार रिलीज होने के समय था। लेकिन अगर किसी एक भूमिका ने असरानी को हमेशा के लिए अमर कर दिया, तो वह रमेश सिप्पी की 1975 की क्लासिक ‘शोले’ में सनकी जेल वार्डन की उनकी भूमिका थी।
अपनी घूमती आंखों, सैन्य टोपी और अतिरंजित अंग्रेजी के साथ, असरानी की “हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं!” एक ऐसी पंक्ति बन गई जो फिल्म से भी ज्यादा समय तक जीवित रही, कक्षाओं और थिएटर हॉल में दोहराई गई, और आज भी पीढ़ियों तक कमरों में जीवित है।

गुजराती सिनेमा में योगदान: असरानी की बहुआयामी प्रतिभा
इतने बड़े काम के बावजूद, असरानी (Govardhan Asrani) कभी एक ही दायरे में सिमटे नहीं रहे। उन्होंने 1977 की फ़िल्म ‘चला मुरारी हीरो बनने’ का लेखन, निर्देशन और अभिनय किया, जिसके हास्य और दिलकश अंदाज़ के लिए उन्हें आलोचकों की प्रशंसा मिली।
बाद में उन्होंने ‘सलाम मेमसाब’ (1979) का निर्देशन किया और गुजराती सिनेमा में सक्रिय रहे, जहाँ भी उन्हें दर्शकों का उतना ही प्यार मिला। हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग से नई सहस्राब्दी में प्रवेश करते हुए, असरानी दशकों तक एक स्थायी व्यक्तित्व बने रहे।
2000 के दशक में वापसी: नई पीढ़ी के दिलों में असरानी
2000 के दशक में, ‘हेराफेरी’, ‘भागम भाग’, ‘धमाल’, ‘वेलकम’ और ‘भूल भुलैया’ में अपनी भूमिकाओं से उन्होंने (Govardhan Asrani) युवा दर्शकों के बीच नई लोकप्रियता हासिल की, जिससे एक बार फिर साबित हुआ कि उनकी हास्य टाइमिंग पहले की तरह ही पैनी है।

पुरस्कार और सम्मान: असरानी की उपलब्धियाँ और पहचान
असरानी के काम ने उन्हें अनेक सम्मान दिलाए, जिनमें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के लिए दो फिल्मफेयर पुरस्कार भी शामिल हैं, लेकिन शायद उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि दर्शकों को बिना किसी दुर्भावना के हंसाने की उनकी क्षमता थी, जो कुछ अभिनेता स्वाभाविक रूप से कर पाते हैं।
परिवार और निजी जीवन
असरानी के परिवार में उनकी पत्नी मंजू असरानी, उनकी बहन और भतीजा हैं। दंपति की कोई संतान नहीं थी। कई लोगों के लिए, उनका निधन एक ऐसे युग का अंत है, जब बॉलीवुड में हास्य की बजाय मासूमियत और समयबद्धता पर आधारित था। असरानी (Govardhan Asrani) अभिनेताओं की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे जिन्होंने कला और मनोरंजन को सहजता से जोड़ा और ऐसे किरदार छोड़े जिन्हें दशकों बाद भी पीढ़ियाँ याद रखती हैं।









