लखनऊ : भारत की स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था की सबसे निचली लेकिन सबसे मजबूत कड़ी ‘आंगनवाड़ी’ है। देश भर में करीब 14 लाख और उत्तर प्रदेश में लगभग 75 से 95 हजार केंद्र करोड़ों बच्चों और महिलाओं के पोषण की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यहाँ 6 साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को न केवल राशन और पका हुआ भोजन दिया जाता है, बल्कि टीकाकरण और प्री-स्कूल शिक्षा (नर्सरी शिक्षा) की नींव भी यहीं रखी जाती है। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिनके कंधों पर देश के भविष्य को गढ़ने की जिम्मेदारी है, क्या उन्हें खुद का हक और सम्मान मिल पा रहा है?
काम का बोझ और मानदेय का ‘असंतुलन’
उत्तर प्रदेश में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में काफी चुनौतीपूर्ण है। जहाँ हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में कार्यकर्ताओं को ₹14,000 से ₹15,000 तक मिलते हैं, वहीं यूपी में यह राशि मात्र ₹8,000 के आसपास सिमट कर रह गई है। मिनी कार्यकर्ताओं को ₹6,000 और सहायिकाओं को लगभग ₹4,000 प्रति माह मानदेय दिया जाता है। इस भारी अंतर का सबसे बड़ा कारण यूपी में कार्यकर्ताओं की विशाल संख्या (करीब 3.5 लाख) है, जिससे सरकार पर बड़ा वित्तीय बोझ पड़ता है। साथ ही, इन्हें ‘सरकारी कर्मचारी’ न मानकर ‘मानदेय कर्मी’ माना जाता है, जिससे ये न्यूनतम वेतन कानून के दायरे से बाहर रह जाती हैं।
स्मार्ट केंद्र बनाम कार्यकर्ताओं की कड़वी हकीकत
सरकार एक तरफ आंगनवाड़ी केंद्रों को “स्मार्ट” बनाने पर जोर दे रही है, जहाँ 3D वॉल पेंटिंग, स्मार्ट क्लास और बाल-मैत्री शौचालयों जैसी सुविधाएं जोड़ी जा रही हैं। लेकिन दूसरी तरफ, जमीनी हकीकत यह है कि ₹8,000 में घर चलाना इन कार्यकर्ताओं के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि उन्हें पोषण ट्रैकर में डेटा एंट्री से लेकर चुनाव ड्यूटी और जनगणना तक के अतिरिक्त काम करने पड़ते हैं, लेकिन मोबाइल रिचार्ज तक का खर्च उन्हें अपनी जेब से देना पड़ता है। काम का दायरा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन आर्थिक स्थिति स्थिर बनी हुई है।
फरवरी 2026: सड़कों पर उतरा ‘आंगनवाड़ी मोर्चा’
इसी आर्थिक तंगी और अनदेखी के खिलाफ 17 फरवरी 2026 को लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भारी विरोध प्रदर्शन हुआ। ‘आंगनवाड़ी संयुक्त मोर्चा’ के बैनर तले हजारों कार्यकर्ताओं ने अपनी आवाज बुलंद की। उनकी मांगें स्पष्ट हैं: उन्हें राज्य कर्मचारी का दर्जा दिया जाए, मानदेय बढ़ाकर कम से कम ₹18,000 किया जाए और सेवानिवृत्ति पर ₹10 लाख का लाभ मिले। कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर ठोस विचार नहीं हुआ, तो 8 मार्च (महिला दिवस) को पूरे प्रदेश में एक बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा।
सम्मान और भुगतान का सवाल
हालाँकि सरकार ने हालिया बजट में केंद्रों की मरम्मत के लिए ₹50 करोड़ का प्रावधान किया है और मानदेय में मामूली बढ़ोतरी की बात कही है, लेकिन प्रदर्शनकारी इसे नाकाफी मान रहे हैं। यह बहस अब केवल वेतन की नहीं, बल्कि उस ‘सम्मान’ की है जो मोहल्ले-मोहल्ले जाकर बच्चों की सेहत का ख्याल रखने वाली इन महिलाओं को मिलना चाहिए। जब तक जिम्मेदारी और भुगतान के बीच का यह फासला कम नहीं होगा, तब तक बचपन की यह ‘नींव’ खुद को असुरक्षित महसूस करती रहेगी।









