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15 मार्च को ‘लखनऊ चलो’ का हुंकार; क्या Mayawati का शक्ति प्रदर्शन बसपा के ‘रिवाइवल’ की राह खोलेगा?

Mayawati

लखनऊ का कांशीराम स्मारक 15 मार्च को एक बार फिर नीले झंडों और समर्थकों के शोर से पटने वाला है। बसपा प्रमुख Mayawati ने संस्थापक कांशीराम की जयंती को एक बड़े शक्ति प्रदर्शन के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। ‘लखनऊ चलो’ के नारे के साथ जुट रही यह भीड़ केवल एक जयंती समारोह नहीं, बल्कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बसपा का अपनी प्रासंगिकता (Relevance) सिद्ध करने का एक बड़ा दांव है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल भीड़ जुटाने से बसपा अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पा सकेगी? आइए समझते हैं इस आंदोलन के पीछे के सियासी समीकरणों और चुनौतियों को।

कोर वोट बैंक में सेंध: ‘सोशल इंजीनियरिंग’ बनाम ‘PDA’

बसपा की सबसे बड़ी चुनौती उसका अपना बिखरता हुआ ‘कोर वोट बैंक’ है। जिस दलित-पिछड़ा गठजोड़ के दम पर Mayawati ने यूपी की सत्ता संभाली थी, आज उसमें दो बड़ी सेंध लग चुकी है। एक तरफ भाजपा ने ‘गैर-जाटव दलित’ और ‘अति पिछड़ों’ को विकास और हिंदुत्व के नैरेटिव से अपने पाले में किया है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव ने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर बसपा के पारंपरिक आधार में हिस्सेदारी कर ली है। ऐसे में मायावती के सामने सबसे बड़ा संकट अपने ‘कैडर’ को यह विश्वास दिलाने का है कि बसपा अभी भी उनके हितों की सबसे बड़ी रक्षक है।

15 मार्च की रणनीति: ‘सर्वाइवल’ और ‘नेगोशिएशन’ की जंग

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा अब पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बजाय ‘किंगमेकर’ की भूमिका में लौटने की कोशिश कर रही है। 15 मार्च को लखनऊ के पुराने जेल रोड स्थित स्मारक पर Mayawati खुद मोर्चा संभालेंगी। इस रैली का मकसद केवल जोश भरना नहीं, बल्कि चुनावी तैयारियों का आगाज़ करना भी है। सूत्रों के मुताबिक, इसी दिन जालौन, आजमगढ़ और जौनपुर जैसी महत्वपूर्ण सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम फाइनल किए जा सकते हैं। मायावती की योजना चुनाव से काफी पहले 50-60 प्रत्याशी मैदान में उतारने की है, ताकि वे जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकें।

आकाश आनंद का राजस्थान दौरा और ‘ब्रैंड बसपा’ की री-पैकेजिंग

उत्तर प्रदेश में जहाँ Mayawati कमान संभाल रही हैं, वहीं राजस्थान में आकाश आनंद रैलियों के जरिए युवाओं को जोड़ने की कोशिश करेंगे। यह बसपा की उस रणनीति का हिस्सा है जिसमें पार्टी अब नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे कर खुद को ‘री-ब्रैंड’ करना चाहती है। बसपा यह दिखाना चाहती है कि भले ही वोट बैंक इधर-उधर हुआ हो, लेकिन उनका सांगठनिक ढांचा (Structure) आज भी अडिग है। 15 मार्च की भीड़ यह तय करेगी कि आने वाले समय में गठबंधन के मेज पर बसपा की ‘बारगेनिंग पावर’ कितनी होगी।

क्या यह केवल ‘प्रेजेंस’ दर्ज कराने की कोशिश है?

लब्बोलुआब यह है कि बसपा इस वक्त अस्तित्व (Survival) की लड़ाई लड़ रही है। 15 मार्च का जमावड़ा यह संकेत देगा कि क्या बसपा का कैडर आज भी Mayawati के एक इशारे पर सड़क पर उतरने को तैयार है। यदि यह भीड़ वोटों में तब्दील नहीं होती, तो बसपा महज एक ऐसी पार्टी बनकर रह जाएगी जो दूसरों का खेल बिगाड़ने या बनाने के लिए मोल-तोल करेगी। क्या मायावती का यह ‘आसमानी दांव’ जमीन पर रंग लाएगा या बसपा सिर्फ एक ‘वोट कटवा’ पार्टी की छवि में सिमट कर रह जाएगी, इसका फैसला 15 मार्च की हलचल और 2027 के चुनावी नतीजे ही

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