उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुरानी कहावत है—”दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है।” लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए जो बिसात बिछाई जा रही है, उसका केंद्र अब लखनऊ नहीं बल्कि कान्हा की नगरी Mathura बनता दिख रहा है। अयोध्या में राम मंदिर का सपना पूरा होने के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि क्या ‘कृष्ण जन्मभूमि’ बीजेपी के लिए वह चाबी साबित होगी, जो उन्हें दोबारा सत्ता के शिखर पर पहुँचाएगी? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि “कृष्ण की कृपा रही तो यहाँ भी अयोध्या जैसा भव्य विकास होगा”, महज़ एक बयान नहीं बल्कि 2027 की एक गहरी राजनीतिक रणनीति है।
जातीय दरारों को भरने का ‘धार्मिक फॉर्मूला’
पिछले लोकसभा चुनावों के नतीजों ने बीजेपी के लिए एक ‘अलार्म’ बजा दिया है। विपक्ष के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नैरेटिव ने बीजेपी के सुरक्षित किले में अच्छी-खासी सेंध लगा दी है। इसके अलावा, पिछले कुछ समय में ठाकुर-ब्राह्मण खींचतान और धार्मिक गुरुओं से जुड़े विवादों ने पार्टी के सामने चुनौतियां खड़ी की हैं। बीजेपी के रणनीतिकारों को पता है कि इन जातीय दरारों को भरने का काम केवल एक बड़ा सांस्कृतिक मुद्दा ही कर सकता है। Mathuraका मुद्दा इस कसौटी पर सटीक बैठता है क्योंकि जब बात ‘कान्हा’ की आती है, तो यूपी का यादव, ब्राह्मण और ठाकुर—सब अपनी जाति भूलकर एक ही आस्था से जुड़ जाते हैं।
क्या है असली विवाद? 1968 का वो समझौता और कानूनी लड़ाई
श्री कृष्ण जन्मभूमि (Mathura)और शाही ईदगाह मस्जिद का विवाद सदियों पुराना है। हिंदू पक्ष का दावा है कि औरंगजेब ने 1670 में प्राचीन केशवदेव मंदिर को तुड़वाकर वहाँ मस्जिद बनवाई थी। असली मोड़ 1968 में आया, जब ‘श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान’ और ‘शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट’ के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत मस्जिद को वहां बने रहने की इजाजत मिली थी। अब हिंदू पक्ष इसी समझौते को ‘अवैध’ बताकर रद्द करने की मांग कर रहा है। मामला फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट में है, जहाँ 18 से ज्यादा याचिकाओं के जरिए परिसर के वैज्ञानिक सर्वे (ASI Survey) की मांग की जा रही है।
‘विरासत बनाम विकास’ का नया चुनावी मॉडल
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का Mathura के लिए 300 करोड़ रुपये का बजट पास करना और ब्रज तीर्थ विकास परिषद को एक्टिव करना यह बताता है कि सरकार मथुरा का कायाकल्प अयोध्या की तर्ज पर शुरू कर चुकी है। यह केवल बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) का विकास नहीं है, बल्कि जनता को यह संदेश देने की कोशिश है कि बीजेपी अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। बीजेपी इसी ‘धार्मिक एकजुटता’ के जरिए विपक्ष के ‘जातीय जनगणना’ वाले नैरेटिव को काटना चाहती है। पार्टी के लिए यह मुद्दा एक ‘Survival Plan’ की तरह है, जो छोटे-मोटे राजनीतिक मनमुटाव को शांत कर हिंदुओं को एकजुट कर सकता है।
क्या 2027 की राह आसान होगी?
2027 का चुनाव केवल सड़कों और बिजली के मुद्दों पर नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक गौरव’ के नाम पर लड़ा जाएगा। Mathura का मुद्दा बीजेपी के लिए वह ढाल है जो उसे विपक्षी हमलों से बचा सकती है और वह हथियार भी, जो उसे जीत दिला सकती है। अब सवाल यह है कि क्या कान्हा की कृपा से 2027 की राह आसान होगी या विपक्ष का ‘PDA’ मॉडल इस धार्मिक लहर को रोक पाएगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि 2027 की चुनावी पिच पर ‘मथुरा’ सबसे बड़ा खिलाड़ी होने वाला है।









