यह खबर भारतीय राजनीति में विपक्षी एकजुटता और दो कद्दावर महिला नेताओं के बीच आपसी समर्थन को दर्शाती है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हालिया कार्रवाई के बीच महबूबा मुफ्ती का यह बयान ममता बनर्जी के लिए एक मजबूत राजनीतिक ढाल बनकर उभरा है।

आई-पैक (I-PAC) दफ्तर पर ED की छापेमारी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ शुरू हुई कानूनी जंग के बीच महबूबा मुफ्ती (Mehbooba Mufti) ने दीदी को ‘शेरनी’ करार दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) वो शख्सियत नहीं हैं जो झुक जाएं या डर जाएं। महबूबा का यह बयान उस वक्त आया है जब कोलकाता की सड़कों से लेकर दिल्ली के गलियारों तक ED की रेड को लेकर घमासान मचा है। यह केवल एक समर्थन नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष की गोलबंदी का एक नया ‘वार क्राई’ (War Cry) है।”
छापेमारी को लेकर उठाए सवाल
महबूबा मुफ्ती ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में ईडी या अन्य जांच एजेंसियों द्वारा इस तरह की छापेमारी एक सामान्य बात हो गई है, लेकिन पूरा देश अब इसका स्वाद चख रहा है। पीडीपी चीफ ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को निरस्त किये जाने के बाद उनकी, फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला की गिरफ्तारी को लेकर कहा, ‘‘जब अनुच्छेद 370 को निरस्त किया गया, तब छापे मारे गए थे और तीन मुख्यमंत्रियों को जेल में डाला गया था, उस वक्त अधिकांश राजनीतिक दलों ने चुप्पी साधे रखी। अब यही स्थिति पूरे देश में देखने को मिल रही है।’’

पीडीपी प्रमुख ने कहा, ‘‘बनर्जी बहुत बहादुर हैं, वह एक शेरनी हैं, वह बेहतर ढंग से उनका मुकाबला करेंगी और आत्मसमर्पण नहीं करेंगी।’’
छापेमारी का संदर्भ: यह समर्थन ED द्वारा आई-पैक (I-PAC) के दफ्तर पर की गई छापेमारी और उसके बाद ममता बनर्जी पर ‘सबूत मिटाने’ के आरोपों के बाद आया है।
विपक्षी एकता: महबूबा के इस बयान को ‘इंडिया गठबंधन’ (INDIA Alliance) की एकजुटता के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ अन्य विपक्षी नेताओं ने भी भाजपा सरकार पर एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया है।
बंगाल का माहौल: कोलकाता में टीएमसी कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे राज्य में संवैधानिक संकट जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
“महबूबा मुफ्ती का ममता बनर्जी के पक्ष में खड़ा होना यह दिखाता है कि क्षेत्रीय दल अब केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की ओर बढ़ रहे हैं। जहाँ ममता बनर्जी खुद को ‘बंगाल की बेटी’ और ‘एकमात्र योद्धा’ के रूप में पेश कर रही हैं, वहीं महबूबा जैसे नेताओं का समर्थन इस नैरेटिव को और मजबूत करता है कि यह लड़ाई केवल कानून की नहीं, बल्कि राजनीतिक वजूद की है। अब देखना यह होगा कि 14 जनवरी को जब हाईकोर्ट में इस मामले की दोबारा सुनवाई होगी, तो क्या ममता बनर्जी इसी ‘शेरनी’ वाले अंदाज में कानूनी मोर्चे पर भी जीत हासिल कर पाती हैं या नहीं।”









