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रोटी-बेटी के रिश्तों पर ‘कानूनी’ पहरा: भारत-नेपाल सरहद की वो बहुएं, जो घर की लक्ष्मी तो हैं पर देश की नागरिक नहीं!

स्पेशल रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश के तराई वाले इलाकों में एक ऐसी सरहद है जहाँ न कोई दीवार है और न ही कटीली तारें, लेकिन फिर भी वहाँ एक ऐसी अदृश्य दीवार खड़ी हो गई है जिसने हज़ारों परिवारों की खुशियों को ‘पेंडिंग’ में डाल दिया है। सिद्धार्थनगर, महराजगंज, बलरामपुर और पीलीभीत जैसे जिलों में नेपाल से ब्याह कर भारत आईं बहुओं के लिए अब एक नया कानूनी पेच फँस गया है, जिसने सदियों पुराने ‘रोटी-बेटी’ के रिश्ते पर सवालिया निशान लगा दिया है। कड़वा सच यह है कि सालों से यहाँ रह रहीं, यहाँ के बच्चों की माँ और घर की गृह-लक्ष्मी होने के बावजूद, ये महिलाएं तब तक भारत की मतदाता नहीं बन सकतीं जब तक वे लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरकर भारत की नागरिकता हासिल नहीं कर लेतीं। यह मुद्दा सिर्फ राजनीति का नहीं, बल्कि उन महिलाओं के अस्तित्व का है जो सरहद पार से एक नया जीवन शुरू करने आई थीं।

1950 की संधि और नागरिकता का कानूनी पेच

1950 की भारत-नेपाल शांति संधि के मुताबिक, नेपाली नागरिक भारत में ‘वैध निवासी’ की तरह रह सकते हैं और बिना किसी वीज़ा के काम कर सकते हैं, लेकिन कानून की किताब में ‘निवासी’ और ‘नागरिक’ के बीच एक बहुत गहरी खाई है। चुनाव आयोग का सिस्टम अब इतना सख्त हो गया है कि वोटर लिस्ट में नाम सिर्फ उसी का होगा जो आधिकारिक रूप से भारत का नागरिक है। नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत, यदि कोई नेपाली महिला भारतीय पुरुष से शादी करती है, तो उसे नागरिकता के लिए आवेदन करना होता है, जिसकी पहली शर्त 7 साल तक लगातार भारत में रहने का पक्का सबूत देना है। ग्रामीण इलाकों में जहाँ लोग कागजी कार्रवाई में कच्चे हैं, वहाँ मैरिज रजिस्ट्रेशन और जिलाधिकारी से लेकर गृह मंत्रालय तक की लंबी फाइलें इस 7 साल के इंतज़ार को 20 साल में बदल देती हैं, जिससे वे महिलाएं अपनी ही सरकार चुनने के हक से वंचित रह जाती हैं।

तारीखों का जाल और परिवारों में पैदा होता ‘लीगल आउटसाइडर’

इस जटिलता में सारा खेल तारीखों और परिभाषाओं का है, जिसने परिवारों के भीतर ‘लीगल आउटसाइडर’ जैसी स्थिति पैदा कर दी है। 1987 से पहले भारत का कानून काफी उदार था, जहाँ जन्म के आधार पर नागरिकता मिल जाती थी, लेकिन 2004 के बाद नियमों को और कड़ा कर दिया गया। हालाँकि भारत-नेपाल संधि की वजह से ये बहुएं ‘अवैध प्रवासी’ नहीं मानी जातीं और उनके बच्चों को नागरिकता मिलने में दिक्कत नहीं आती, लेकिन असली समस्या दस्तावेजी स्टेटस की है। अक्सर देखा जाता है कि एक ही घर में पिता के पास भारत का वोटर आईडी है और बच्चों के पास आधार कार्ड, लेकिन माँ के पास सिर्फ नेपाल का नागरिकता प्रमाण पत्र होने की वजह से राशन कार्ड या अन्य सरकारी योजनाओं से उनका नाम कट जाता है। यह स्थिति उन्हें परिवार के भीतर ही एक तकनीकी बाहरी व्यक्ति बना देती है।

नेपाल का ‘जैसे को तैसा’ रुख और वैश्विक कूटनीति

इस कहानी में खटास तब और बढ़ गई जब नेपाल ने भी अपनी तरफ से ‘जैसे को तैसा’ वाला रुख अपनाते हुए अपने कानूनों में बदलाव कर दिया। पहले नेपाल में भारतीय लड़कियों को शादी के तुरंत बाद वहाँ की नागरिकता मिल जाती थी, लेकिन अब नेपाल के नए नागरिकता संशोधन बिल के तहत भारतीय बहुओं के लिए भी 7 साल का ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ रख दिया गया है। जब हम वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तो अमेरिका जैसे देशों में नागरिक से शादी करने पर नागरिकता का रास्ता 3 साल में साफ हो जाता है, जबकि कनाडा और ब्राजील जैसे देशों में आज भी ‘मिट्टी का हक’ यानी जन्मजात नागरिकता सर्वोपरि है। भारत और नेपाल के बीच जब संस्कृति और खान-पान में कोई अंतर ही नहीं है, तो इन बहुओं के लिए यह कागजी अग्निपरीक्षा बेहद कठिन महसूस होती है। सुरक्षा और राजनीति अपनी जगह जरूरी है, लेकिन इन महिलाओं के लिए एक ‘फास्ट-ट्रैक’ सिस्टम वक्त की मांग है ताकि सरहद की ये बेटियां और बहुएं इस कानूनी चक्रव्यूह से बाहर निकल सकें।

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