Ola Uber Rapido Strike: आज सुबह जब देश जागा, तो सड़कों पर वो शोर नहीं था जो हर रोज होता है। आज उन पहियों ने थमने का फैसला किया है, जो चौबीस घंटे हमें मंज़िल तक पहुँचाते थे। जी हाँ, फूड डिलीवरी बॉयज के संघर्ष की आग अब ऐप-आधारित टैक्सी और बाइक सर्विस तक पहुँच गई है। आज देश के कई हिस्सों में ओला, उबर और रैपिडो के हजारों ड्राइवरों ने काम बंद कर ‘महा-हड़ताल’ का बिगुल फूंक दिया है।
Ola Uber Rapido Strike: मजबूरी का वो शोर… जो कानों के पर्दे फाड़ दे!
यह सिर्फ एक हड़ताल नहीं है, यह उन सिसकियों का सैलाब है जो बंद गाड़ियों के अंदर दम तोड़ रही थीं। चिलचिलाती धूप हो या हड्डियों को कपा देने वाली ठंड, ये ‘ऑनलाइन राइडर्स’ (ड्राइवर्स) दिन-रात सड़कों पर दौड़ते रहे। लेकिन बदले में क्या मिला? आसमान छूती महंगाई, बढ़ता कमीशन और घटती कमाई! आज इन ड्राइवरों ने साफ कर दिया है कि अब वो और चुप नहीं रहेंगे। (Ola Uber Rapido Strike)
ड्राइवरों का कहना है कि उनकी ये हड़ताल शासन के उन बंद कानों को खोलने के लिए है, जहाँ उनकी चीखें नहीं पहुँचतीं। ”हम भी इंसान हैं, मशीन नहीं! हमारी मांगें जायज हैं, हम सिर्फ अपने हक का न्याय मांग रहे हैं।” – एक प्रदर्शनकारी ड्राइवर की डबडबाई आँखें पूरी कहानी बयां कर रही थीं।
जनता बेहाल, सरकार लाचार?
पूरे देश से ऐसी तस्वीरें आ रही हैं जो सरकार को हिला देने वाली हैं। कहीं ऑफिस जाने वाले लोग सड़कों पर घंटों इंतजार कर रहे हैं, तो कहीं बुजुर्ग अस्पताल जाने के लिए लिफ्ट मांगते दिख रहे हैं। जनता इस बात से हैरान है कि जो सिस्टम एक क्लिक पर चलता था, वह आज पूरी तरह ठप पड़ गया है। (Ola Uber Rapido Strike)
इस हड़ताल ने सीधे तौर पर ऊपर बैठी सत्ता को चुनौती दी है। मांग सीधी है—एक ऐसी नई गाइडलाइन, जो इन ड्राइवरों को ‘मजदूर’ नहीं बल्कि ‘सम्मानित कर्मी’ का दर्जा दे। क्या सरकार इनकी मजबूरियों को देखकर कोई ठोस कदम उठाएगी, या फिर ये ‘सड़कों के सारथी’ यूं ही उपेक्षित होकर सड़कों पर आंसू बहाते रहेंगे?









