दिल्ली से कोलकाता तक हड़कंप: 20 सांसदों का चौंकाने वाला कदम
भारतीय राजनीति ने बगावत, गुटबाजी और सत्ता के समीकरण बदलते कई बार देखे हैं, लेकिन इस बार जो हुआ है, उसने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सबको हैरान कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों ने सिर्फ पार्टी से दूरी नहीं बनाई, बल्कि सीधे एक ऐसी गुमनाम पार्टी में विलय (Merge) कर लिया, जिसका नाम कुछ महीने पहले तक राजनीति के जानकारों ने भी शायद ही सुना हो। यह दल है, नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI)। पहली नजर में 20 सांसदों वाले इतने बड़े गुट का एक छोटी सी क्षेत्रीय पार्टी में शामिल होना अजीब लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक बहुत बड़ा कानूनी और रणनीतिक खेल चल रहा है। TMC MPs Merge With NCPI
एंटी-डिफेक्शन लॉ का तोड़: क्यों चुनी गई NCPI?
इस बगावत और विलय की पूरी कहानी को समझने के लिए संसद के भीतर के संख्या बल और संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law – दलबदल कानून) को समझना होगा:
- लोकसभा सदस्यता बचाने का दांव: अगर ये 20 सांसद सीधे टीएमसी छोड़कर भाजपा या किसी अन्य बड़ी पार्टी में शामिल होते, तो दलबदल कानून के तहत उनकी लोकसभा सदस्यता तुरंत रद्द हो सकती थी।
- दो-तिहाई (2/3) का जादुई आंकड़ा: दलबदल कानून से बचने के लिए मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसदों का एक साथ अलग होना जरूरी है। चूंकि लोकसभा में टीएमसी के कुल 28 सांसद हैं, इसलिए 20 सांसदों का यह गुट तकनीकी रूप से दो-तिहाई से ज्यादा है।
- अस्थायी लाइफबोट: नई पार्टी बनाने में चुनाव आयोग की लंबी प्रक्रिया, कानूनी विवाद और संसदीय मान्यता के झंझट होते हैं। ऐसे में पहले से रजिस्टर्ड पार्टी NCPI इन बागी सांसदों के लिए एक ‘राजनीतिक लाइफबोट’ बन गई, जिसने इन्हें बिना सदस्यता गंवाए सुरक्षित ठिकाना दे दिया। TMC MPs Merge With NCPI
त्रिपुरा में NOTA से भी कम वोट, संसद में अचानक बड़ी ताकत
राजनीतिक इतिहास और जमीन के लिहाज से देखें तो NCPI की कोई बड़ी बिसात नहीं थी। साल 2023 में बनी इस पार्टी का न तो कोई संसदीय इतिहास रहा और न ही बड़ा जनाधार। यहाँ तक कि त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इसके उम्मीदवारों को नोटा (NOTA) से भी कम, यानी महज 1,200 के करीब वोट मिले थे और चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में इसका चंदा भी कुछ लाख रुपये ही था। लेकिन कहते हैं न कि राजनीति में ताकत कभी-कभी वोटों से नहीं, बल्कि ‘कानूनी उपयोगिता’ से तय होती है। इसी उपयोगिता के तहत बागी सांसदों ने पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर अलग बैठने की मांग की और फिर NCPI में विलय का ऐलान कर दिया। TMC MPs Merge With NCPI
इस राजनीतिक भूकंप के 3 सबसे बड़े प्रभाव
1. ममता बनर्जी के लिए अब तक का सबसे बड़ा झटका
लोकसभा में सांसदों की संख्या हमेशा से ममता बनर्जी की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी और दिल्ली की राजनीति में उनकी ताकत रही है। 28 में से 20 सांसदों का एक झटके में अलग हो जाना न सिर्फ संसद में उनकी आवाज को कमजोर करेगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत विरोधी बनने के उनके दांव को भी कमजोर करेगा।
2. ‘असली टीएमसी’ पर दावे की तैयारी?
कहानी सिर्फ विलय पर खत्म नहीं होती। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल पहला चरण है। दो-तिहाई से ज्यादा की संख्या होने के कारण ये बागी सांसद भविष्य में चुनाव आयोग के सामने जाकर टीएमसी के नाम, संगठन और चुनाव चिन्ह (Twin Flowers) पर अपना दावा ठोक सकते हैं, जैसा हाल ही में शिवसेना और एनसीपी के मामलों में देखा जा चुका है।
3. संसद में एनडीए (NDA) को सीधा फायदा
बागी सांसदों ने साफ कर दिया है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए के साथ मिलकर काम करेंगे। भले ही वे सीधे भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन संसद के भीतर उनका यह समर्थन केंद्र सरकार को लोकसभा में फ्लोर मैनेजमेंट के दौरान एक अभूतपूर्व मजबूती देगा।
NCPI के भीतर भी असंतोष की चिंगारी
हालाँकि, इस विलय के बाद NCPI के भीतर भी अंतर्विरोध शुरू हो गए हैं। पार्टी के कुछ संस्थापक नेताओं ने खुलकर नाराजगी जताई है कि जो पार्टी हमेशा टीएमसी विरोधी राजनीति की बात करती थी, उसमें अचानक इतने बड़े पैमाने पर टीएमसी के ही नेताओं का आ जाना संगठन की मूल विचारधारा को खत्म कर देगा। साफ है कि आने वाले दिनों में इस छोटी सी पार्टी के भीतर भी वर्चस्व की जंग देखने को मिल सकती है। TMC MPs Merge With NCPI








