भारतीय राजनीति में दलित अस्मिता की सबसे बड़ी आवाज मानी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि वर्ष 2026 बसपा के लिए पिछले 41 सालों का सबसे ‘बुरा साल’ साबित हो सकता है। जिसका अंदाजा शायद खुद बसपा सुप्रीमो मायावती को भी नहीं होगा। लेकिन वो कहते है ना कि वक्त और किस्मत कब पलट जाए पता ही नहीं चलता है। कुछ ऐसा ही अब मायावती के साथ नए साल में होने वाला है।

संसद के दोनों सदनों में बसपा होगी सिफर
आपको बताते चले कि पहली बार ऐसा होने जा रहा है कि संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में बसपा का एक भी प्रतिनिधि नहीं होगा। इस तरह बसपा की आवाज नवंबर 2026 में संसद में सुनाई नहीं देगी?बात करें 2024 के लोकसभा चुनाव की तो उसमें मायावती की पार्टी सिफर पर सिमट गई थी। हालंकि अब संसद में बसपा के पास एकलौते सदस्य रामजी गौतम हैं, जो राज्यसभा में हैं। रामजी गौतम का कार्यकाल 2026 में समाप्त हो जाएगा। इसके बाद संसद में बसपा का एक भी सदस्य नहीं रह जाएगा। बसपा के राजनीतिक इतिहास में पहली बार होगा जब संसद के दोनों सदनों यानि लोकसभा और राज्यसभा में बसपा के सदस्य की संख्या शून्य होगी।

2026 में रामजी संसद से हो जाएंगे रिटायर
यूपी के 10 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल नवंबर 2026 में खत्म हो रहा है। इन 10 राज्यसभा सांसदों में बीजेपी के 8, सपा और बसपा के एक-एक सदस्य हैं, जिनका कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को खत्म हो रहा है। 2026 में रिटायर होने वाले राज्यसभा सांसदों में बीजेपी से बृजलाल, सीमा द्विवेदी, चंद्रप्रभा उर्फ गीता, हरदीप सिंह पुरी, दिनेश शर्मा, नीरज शेखर, अरुण सिंह और बीएल वर्मा का नाम शामिल हैं। सपा से प्रोफेसर रामगोपाल यादव हैं तो बसपा से रामजी गौतम हैं।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि साल 2026 में मायावती का ‘शून्य’ होना मायावती के लिए एक बड़ा अलार्म है। क्या मायावती के उत्तराधिकारी आकाश आनंद युवाओं और दलित वोट बैंक को फिर से जोड़ पाएंगे? हाल ही में बसपा ने जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने के लिए नए प्रभारियों की नियुक्ति की है।
”बसपा का इतिहास संघर्षों का रहा है, लेकिन 2026 की चुनौती अभूतपूर्व है। संसद में ‘जीरो’ होना केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस आंदोलन के लिए एक बड़ा धक्का है, जिसे मान्यवर कांशीराम ने अपने खून-पसीने से सींचा था।”









