बांग्लादेश की राजनीति में उस वक्त हड़कंप मच गया जब चुनाव आयोग ने देश के प्रमुख हिंदू नेता गोबिंद चंद्र प्रमाणिक का नामांकन पत्र खारिज कर दिया। विशेष बात यह है कि गोबिंद चंद्र ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पारंपरिक सीट से चुनाव लड़ने का पर्चा दाखिल किया था। इस फैसले के बाद बांग्लादेश में अल्पसंख्यक राजनीति और चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं।
आपको बताते चलें कि, गोबिंद चंद्र प्रमाणिक, जो बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोत के महासचिव हैं और जिन्हें आरएसएस (RSS) की विचारधारा से प्रभावित माना जाता है, ने उस सीट से दावेदारी पेश की थी जो लंबे समय तक शेख हसीना का गढ़ रही है। उनके नामांकन के बाद माना जा रहा था कि वे अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट कर एक बड़ी चुनौती पेश करेंगे, लेकिन तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए उनका पर्चा रद्द कर दिया गया।

नामांकन रद्द होने के तुरंत बाद गोबिंद चंद्र प्रमाणिक ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे एक गहरी राजनीतिक साजिश करार देते हुए सीधे तौर पर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि “यह लोकतंत्र की हत्या है। BNP के दबाव में चुनाव आयोग ने मेरा नामांकन जानबूझकर खारिज किया है ताकि अल्पसंख्यक समुदाय की आवाज को सदन तक पहुँचने से रोका जा सके। वे नहीं चाहते कि कोई मजबूत हिंदू चेहरा चुनाव मैदान में रहे।” और उन्होंने दावा किया कि उनके दस्तावेजों में कोई कमी नहीं थी और यह कार्रवाई केवल उन्हें चुनावी रेस से बाहर करने के लिए की गई है।

इस घटनाक्रम ने बांग्लादेश में रह रहे हिंदू समुदाय और अन्य अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है। पिछले कुछ समय से बांग्लादेश में जारी राजनीतिक अस्थिरता के बीच एक प्रमुख हिंदू नेता का चुनाव लड़ने से रोका जाना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। फिलहाल गोबिंद चंद्र प्रमाणिक ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। यदि कोर्ट से उन्हें राहत नहीं मिलती है, तो यह सीट एकतरफा होने की संभावना है, जिससे चुनाव की साख पर सवाल खड़े हो सकते हैं।









