यूपी की सियासत में पारा काफी ज़्यादा गर्म होता जा रहा है। कुछ दिन पहले कुलदीप सिंह सेंगर की ज़मानत को लेकर बवाल मच गया है। जिस पर आज सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुना दिया है, इसी के साथ दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया है।
हालांकि इतने संघर्ष, विरोध प्रदर्शन और सीबीआई की एड़ी-चोटी के ज़ोर के बाद आखिर उन्नाव रेप केस के दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की ज़मानत पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘स्टे’ लगा दिया है। अभी कुछ ही दिन पहले, 23 दिसंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सज़ा पर रोक लगाते हुए उसे बेल दे दी थी। जिसके बाद ऐसा लगा था कि दोषी बाहर आ जाएगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सेंगर के अपराध को देखते हुए ये साफ कर दिया कि सेंगर ने जो किया है वो बेहद गंभीर है और बिना पूरी सुनवाई के इसे रिहा नहीं किया जा सकता। पीड़ित परिवार के लिए ये एक बहुत बड़ी जीत है।

कुलदीप सिंह सेंगर की बेटी का छलका दर्द
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सेंगर की छोटी बेटी इशिता सेंगर ने सोशल मीडिया पर एक लंबा चौड़ा पोस्ट किया है, जिसमें उन्होंने कहा कि उनका अदालत पर भरोसा था और पिता के बाहर निकलने का इंतजार कर रही थीं, लेकिन आज स्थिति बिल्कुल विपरीत हो गई है और उनका विश्वास टूट रहा है।
इशिता ने आगे लिखा है, मैं यह पत्र एक ऐसी बेटी के रूप में लिख रही हूं जो थकी हुई, डरी हुई और धीरे-धीरे विश्वास खो रही है, लेकिन फिर भी उम्मीद से जुड़ी हुई है क्योंकि अब कहीं और जाने की जगह नहीं बची है। आठ वर्षों से, मेरा परिवार और मैं चुपचाप, धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह मानते हुए कि यदि हम सब कुछ ‘सही तरीके से’ करेंगे, तो अंततः सच्चाई स्वयं सामने आ जाएगी। हमने कानून पर भरोसा किया। हमने संविधान पर भरोसा किया। हमने भरोसा किया कि इस देश में न्याय शोर-शराबे, हैशटैग या जन आक्रोश पर निर्भर नहीं करता।

इश्ता का भावुक‘विश्वास टूट रहा, इसलिए लिख रही हूं…’
इशिता ने कहा है कि मेरे शब्द सुने जाने से पहले ही, मेरी पहचान एक लेवल तक सिमट जाती है। भाजपा विधायक की बेटी। मानो इससे मेरी इंसानियत ही मिट जाती है। मानो सिर्फ इसी बात से मैं निष्पक्षता, सम्मान या बोलने के अधिकार से भी वंचित हो जाती हूं। जिन लोगों ने मुझसे कभी मुलाकात नहीं की, एक भी दस्तावेज नहीं पढ़ा, एक भी अदालती रिकॉर्ड नहीं देखा, उन्होंने तय कर लिया है कि मेरे जीवन का कोई मूल्य नहीं है।
कुलदीप सेंगर की बेटी अपने दर्द को बयां करते हुए लिखती है कि इतने सालों में, सोशल मीडिया पर मुझे अनगिनत बार कहा गया है कि मेरा बलात्कार किया जाना चाहिए, मार डाला जाना चाहिए या सिर्फ मेरे अस्तित्व के लिए दंडित किया जाना चाहिए। यह नफरत काल्पनिक नहीं है। यह रोजाना होती है, लगातार हो रही है, और जब आपको एहसास होता है कि इतने सारे लोग मानते हैं कि आप जीने के लायक भी नहीं हैं, तो यह आपको अंदर से तोड़ देता है।
सच्चाई को तमाशे की जरूरत नहीं होती- इशिता
इशिता आगे लिखती हैं, धमकियों और टिप्पणियों के बाद भी हमने मौन इसलिए नहीं चुना क्योंकि हम ताकतवर थे बल्कि इसलिए कि हम संस्थाओं में विश्वास रखते थे. हमने विरोध प्रदर्शन नहीं किया। हमने मीडिया में शोर नहीं मचाया, पुतले नहीं फूकें और न ही हैशटैग ट्रेंड किए. हमने इंतजार किया क्योंकि हमारा मानना था कि सच्चाई को तमाशे की जरूरत नहीं होती है।

उस मौन की हमें क्या कीमत चुकानी पड़ी?
उन्होंने आगे कहा कि हमारी गरिमा को धीरे-धीरे छीन लिया गया है. आठ सालों तक हर दिन हमारा अपमान किया गया, हमारा उपहास किया गया और हमें अमानवीय व्यवहार का सामना करना पड़ा. एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भागते-भागते, पत्र लिखते, फोन करते, अपनी बात सुनाने की गुहार लगाते हुए हम आर्थिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से थक चुके हैं. ऐसा कोई दरवाजा नहीं था जिस पर हमने दस्तक न दी हो. ऐसा कोई नहीं था जिससे हम संपर्क न कर सकें. ऐसा कोई मीडिया हाउस नहीं था जिसे हमने पत्र न लिखा हो. इसके बाद भी हमारी किसी ने नहीं सुनी. लोगों ने इसलिए हमारी नहीं सुनी क्योंकि हमारा सच इनकन्वेनिएंट (असुविधाजनक) था.
इशिता ने कहा है कि लोग हमें ताकतवर कहते हैं, लेकिन मैं पूछना चाहती हूं कि क्या एक ताकतवर परिवार 8 साल तक चुप रह सकता है क्या? हम एक ऐसी व्यवस्था पर भरोसा करते रहे जो आपके अस्तित्व को भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है जबकि आपके नाम को रोजाना बदनाम किया जाता रहा। एक ऐसा भय जो इतना प्रबल है कि न्यायाधीश, पत्रकार, संस्थाएं और आम नागरिक सभी चुप रहने के लिए मजबूर हैं. एक ऐसा डर बनाया गया कि कोई भी हमारे साथ खड़ा होने की हिम्मत न करे।

इशिता के पोस्ट की आखिरी कुछ लाइनें…
- हम कोई एहसान नहीं मांग रहे हैं।
- हम अपनी पहचान के कारण सुरक्षा नहीं मांग रहे हैं।
- हम न्याय मांग रहे हैं क्योंकि हम इंसान हैं।
- कृपया कानून को बिना किसी डर के बोलने दें।
- कृपया सबूतों की जांच बिना किसी दबाव के होने दें।
- कृपया सच्चाई को सच्चाई के रूप में स्वीकार करें, भले ही वह अलोकप्रिय हो।
- मैं एक बेटी हूं जिसे अब भी इस देश पर विश्वास है।
- कृपया मुझे अपने इस विश्वास पर पछतावा न होने दें।









