पश्चिम बंगाल में पहले चरण का मतदान खत्म हो चुका है। लेकिन, इस बार जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है। बंगाल में पहले चरण में 92 प्रतिशत से ज्यादा वोटिंग दर्ज की गई है। यह आंकड़ा 2011 के उस रिकॉर्ड से भी बड़ा है, जब ममता बनर्जी ने 34 साल पुराने वामपंथी किले को ढहाया था।
92% वोटिंग के मायने: बदलाव की लहर या समर्थन का सैलाब?
बंगाल की राजनीति में भारी मतदान हमेशा किसी बड़े उलटफेर का संकेत रहा है। दरअसल, 2011 में जब सत्ता बदली थी, तब 84% वोटिंग हुई थी।
- ऐतिहासिक भागीदारी: इस बार लगभग हर वोटर घर से निकला है।
- युवा और महिलाएं: पहली बार वोट देने वाले युवाओं और महिला वोटरों की संख्या ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
- डर पर भारी लोकतंत्र: संवेदनशील इलाकों में भी लोगों ने हिंसा के डर को पीछे छोड़कर मतदान किया।
यही वजह है कि टीएमसी इसे अपनी योजनाओं के प्रति जनसमर्थन बता रही है। वहीं, बीजेपी का दावा है कि यह भारी मतदान ममता सरकार की विदाई का स्पष्ट संकेत है।
152 सीटों का समीकरण: सत्ता की चाबी किसके पास?
पहले चरण में जिन 152 सीटों पर वोटिंग हुई, वे राज्य की सत्ता तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाती हैं।
- पिछला प्रदर्शन: 2021 में इन 152 सीटों में से टीएमसी ने 115 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी को 46 सीटें मिली थीं।
- दांव पर साख: अगर बीजेपी इन सीटों पर सेंध लगाने में कामयाब रही, तो ममता बनर्जी के लिए सत्ता बचाना मुश्किल हो सकता है।
- SIR फैक्टर: इस बार ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ के तहत वोटर लिस्ट से करीब 12% नाम हटाए गए। परिणामस्वरूप, बचे हुए वोटरों में अपने अधिकार को बचाने की एक अलग ही जंग दिखी।
सुरक्षा का अभेद्य किला और छिटपुट हिंसा
चुनाव आयोग ने इस बार सुरक्षा के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। दरअसल, करीब ढाई लाख जवानों की तैनाती की गई थी।
- कम हुई हिंसा: पिछले चुनावों की तुलना में हिंसा की घटनाएं काफी कम रहीं।
- संवेदनशील बूथ: बीरभूम, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे इलाकों में पथराव की छिटपुट खबरें आईं। लेकिन, सुरक्षा बलों ने तुरंत स्थिति को नियंत्रित कर लिया।
- भरोसे की जीत: मुर्शिदाबाद के डोमकल जैसे इलाकों में सुरक्षा बलों ने खुद लोगों को घर से लाकर वोट डलवाया।
29 अप्रैल को दूसरे चरण की चुनौती
अब सबकी नजरें 29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण पर हैं। दरअसल, इसमें कोलकाता और औद्योगिक बेल्ट की 142 सीटों पर मतदान होना है।
- बदलती रणनीति: राहुल गांधी ने ममता सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं, तो अमित शाह ने ‘घुसपैठ’ को बड़ा मुद्दा बनाया है।
- ममता का दांव: ममता बनर्जी ‘बंगाली अस्मिता’ के जरिए बाहरी बनाम भीतरी का कार्ड खेल रही हैं।
अंततः, यह 92 प्रतिशत वोटिंग किसके पक्ष में गई, इसका फैसला 4 मई को होगा। यही वजह है कि बंगाल की इस चुनावी बिसात ने पूरे देश की धड़कनें बढ़ा दी हैं।









