UP Politics: यूपी में जैसे ही इलेक्शन की घंटी बजती है, वैसे ही कुछ नेताओं की जुबान अचानक बहुत तेज चलने लगती है। संजय निषाद और ओपी राजभर इसकी सबसे ताजा मिसाल हैं, जो पिछले कुछ दिनों में अपने बयानों और मुलाकातों से पूरी यूपी पॉलिटिक्स में हलचल मचाए हुए हैं। पर आखिर इलेक्शन नजदीक आते ही ये नेता इतने एक्टिव क्यों हो जाते हैं, और इनके पीछे का असली गेम क्या है। संजय निषाद की स्टोरी में एक बहुत मजेदार यू टर्न देखने को मिलता है।
UP Politics: मुलाकात, बयान और यू-टर्न; यूपी में शुरू हुआ चुनावी बार्गेनिंग गेम
कुछ दिन पहले संजय निषाद सपा के सीनियर लीडर माता प्रसाद पांडेय से मिलने उनके घर पहुंच गए थे। इसके बाद उन्होंने कई चैनलों पर बयान देते हुए कहा कि सपा ने दरवाजा बंद किया तो वो भाजपा के साथ आ गए, और अगर भाजपा भी दरवाजा बंद करेगी, तो अगले कदम के बारे में सोचेंगे। ये बयान सीधे तौर पर भाजपा को एक वॉर्निंग जैसा लगा, और पॉलिटिकल सर्किल्स में तुरंत ये चर्चा शुरू हो गई कि निषाद NDA से नाराज हैं और सपा की तरफ शिफ्ट हो सकते हैं। लेकिन बस कुछ ही दिनों बाद उनका पूरा टोन एकदम पलट गया।
बुधवार सुबह उन्होंने X पर लिखा कि जिनके घर शीशे के बने होते हैं, वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। उन्होंने सपा नेताओं पर आरोप लगाया कि वो निषाद पार्टी के भविष्य पर अफवाह फैला रहे हैं, और सलाह दी कि सपा को अपनी चिंता छोड़कर कांग्रेस के साथ अपनी सीटों का बंटवारा कर लेना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि निषाद पार्टी को सपा की किसी बैसाखी की जरूरत नहीं है, और NDA में उनका गठबंधन बराबरी और हिस्सेदारी पर आधारित है। (UP Politics)
संजय निषाद से राजभर तक, चुनावी टाइमिंग में छिपा बड़ा गेम
अब जरा सोचिए, कुछ दिन पहले जो शख्स भाजपा को इशारों इशारों में धमकी दे रहा था, वही अब सपा पर सबसे तीखा हमला बोल रहा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे ओपी राजभर बोलते रहे हैं। यही वो पॉलिटिकल टाइमिंग है जो हर इलेक्शन से पहले देखने को मिलती है। दरअसल कहा जा रहा है कि संजय निषाद NDA में सीट शेयरिंग को लेकर असंतुष्ट हैं, यानी उन्हें उतनी सीटें नहीं मिल रहीं जितनी वो चाहते हैं। हालांकि खुद निषाद ने इस बात से इनकार किया है, लेकिन उनका ये अचानक अटैक और डिफेंस मोड में जाना बहुत कुछ कहता है।
इसी बीच निषाद ने कसरवल कांड का जिक्र भी किया, जिसमें उन्होंने कहा कि सपा नेताओं ने निषाद समाज के निर्दोष लोगों पर गोलियां चलवाई थीं, और अब वही लोग समाज के हितैषी बनने का ढोंग कर रहे हैं। ये एक बहुत क्लासिक इलेक्शन स्ट्रैटेजी है, यानी पुराने इमोशनल इशूज को फिर से जगाकर अपने कम्युनिटी वोट बैंक को कंसोलिडेट करना। निषाद ने ये भी कहा कि उनकी पार्टी का जनाधार लगातार बढ़ रहा है जबकि सपा सिकुड़ रही है, और सवाल किया कि खुद शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव कहां जाएंगे। (UP Politics)
अब समझते हैं इसके पीछे की असली वजह। संजय निषाद लंबे समय से निषाद समुदाय को OBC से हटाकर अनुसूचित जाति वर्ग में शामिल करने की मांग कर रहे हैं, और मछुआरों को नौ पर्सेंट रिजर्वेशन देने की डिमांड भी उठाते रहे हैं। जब तक उन्हें लगता है कि उनकी ये मांगें पूरी हो रही हैं और सीट शेयरिंग में उन्हें सही हिस्सा मिल रहा है, तब तक वो NDA के साथ बने रहते हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें असंतोष महसूस होता है, वो तुरंत सपा की तरफ इशारे करना शुरू कर देते हैं, ये दिखाने के लिए कि उनके पास भी ऑप्शन मौजूद हैं।
अब बात करते हैं ओपी राजभर की, जिन्होंने भी बिल्कुल इसी टाइमिंग पर एक बहुत इंटरेस्टिंग कदम उठाया। संजय निषाद के माता प्रसाद पांडेय से मिलने के बाद, अब ओपी राजभर भी उन्हीं से मिलने का ऐलान कर चुके हैं। दिलचस्प बात ये है कि दोनों ने ही अपनी मुलाकात की वजह बताई है सिर्फ माता प्रसाद पांडेय की तबीयत का हालचाल जानना। लेकिन जब सत्ता पक्ष के दो बड़े मंत्री, अलग अलग समय पर, विपक्ष के एक सीनियर नेता से मिलने पहुंचते हैं, तो जाहिर है इसे सिर्फ एक शिष्टाचार मुलाकात नहीं माना जा सकता। (UP Politics)
खास बात ये भी है कि ओपी राजभर अक्सर सपा और अखिलेश यादव पर लगातार पोस्ट करके हमला बोलते रहते हैं, लेकिन पिछले एक हफ्ते से उन्होंने ऐसी कोई पोस्ट नहीं की। यानी उनका ये अचानक शांत हो जाना और फिर माता प्रसाद पांडेय से मिलने का प्लान बनाना, ये भी एक तरह का सिग्नल माना जा रहा है, शायद भाजपा पर सीट शेयरिंग को लेकर दबाव बनाने का एक तरीका। अब जरा इस पूरे पैटर्न को एक साथ जोड़कर देखते हैं। ये कोई नई बात नहीं है, ये हर इलेक्शन से पहले यूपी की पॉलिटिक्स में एक कॉमन ट्रेंड बन चुका है।
छोटी पार्टियां, जो NDA या किसी भी बड़े गठबंधन का हिस्सा होती हैं, इलेक्शन नजदीक आते ही अचानक बहुत एक्टिव हो जाती हैं। वो कभी विपक्ष के नेताओं से मुलाकात करती हैं, कभी अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रोटेस्ट में शामिल हो जाती हैं, जैसे संजय निषाद गोंडा के विनोद साहनी हत्याकांड को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल हुए थे। और कभी सोशल मीडिया पर बड़े बड़े बयान देकर दोनों तरफ से बार्गेनिंग पावर बढ़ाने की कोशिश करती हैं। ये पूरी स्ट्रैटेजी असल में एक बहुत सिंपल पॉलिटिकल गेम है। (UP Politics)
जब ये छोटी पार्टियां भाजपा की तरफ इशारा करती हैं कि हम सपा की तरफ भी जा सकते हैं, तो इसका मतलब होता है वो ज्यादा सीटें और ज्यादा तवज्जो मांग रही हैं। और जब वो अचानक भाजपा के प्रति वफादारी दिखाते हुए सपा पर हमला बोलती हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हें कुछ आश्वासन मिल गया है, या फिर वो एक तरह से अपने असली इरादे छुपाकर दोनों तरफ से बातचीत जारी रखना चाहती हैं। तो कुल मिलाकर, संजय निषाद और ओपी राजभर की ये पॉलिटिकल हरकतें कोई इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि ये बहुत सोची समझी बार्गेनिंग टैक्टिक्स हैं।
इलेक्शन जितना करीब आता है, इन छोटी पार्टियों की जुबान उतनी ही तेज चलने लगती है, कभी सपा की तरफ झुकाव दिखाकर, कभी उसी सपा पर तीखा हमला बोलकर। असली मकसद एक ही है, सीट शेयरिंग में ज्यादा से ज्यादा हिस्सा हासिल करना, और अपने कम्युनिटी वोट बैंक को इमोशनल मुद्दों के जरिए कंसोलिडेट करना। यही वजह है कि जैसे जैसे 2027 का इलेक्शन नजदीक आएगा, ऐसे और भी कई नेता इसी तरह के यूटर्न और मुलाकातों के जरिए अपनी पॉलिटिकल वैल्यू बढ़ाने की कोशिश करते नजर आएंगे। (UP Politics)









