Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को तीन महीने के भीतर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने का ऐतिहासिक आदेश दिया है। 14 अक्टूबर 2026 को जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने इस महत्वपूर्ण मामले पर करीब तीन घंटे तक चली लंबी सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि राज्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए स्थानीय निकाय चुनावों में अनावश्यक देरी नहीं की जा सकती। इस आदेश के बाद से उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
Allahabad High Court: फैसले की मुख्य बातें और कानूनी पहलू
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव से जुड़ी कुल 11 याचिकाओं (जिसमें 6 जनहित याचिकाएं शामिल थीं) पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किया। याचिकाओं में मुख्य रूप से पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव में हो रही देरी और निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाए रखने के सरकार के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने वाले शासनादेश को रद्द नहीं किया है। इसका मतलब है कि चुनाव संपन्न होने तक वर्तमान ग्राम प्रधान ही प्रशासक के रूप में अपना कामकाज देखते रहेंगे।
अदालत ने साफ किया कि पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग जातिगत जनगणना और डेटा जुटाने का अपना काम जारी रख सकता है, लेकिन पंचायत चुनाव की प्रक्रिया आयोग की रिपोर्ट के इंतजार में रोकी नहीं जाएगी। चुनाव मौजूदा नियमों और निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण के ढांचे के तहत ही समय सीमा में पूरे करने होंगे। (Allahabad High Court)
याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद 243-E और उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-A) का हवाला दिया गया था। इसके अनुसार, किसी भी पंचायत का कार्यकाल पहली बैठक से ठीक 5 वर्ष का होता है और विशेष परिस्थितियों में भी वैकल्पिक व्यवस्था को 6 महीने से अधिक नहीं खींचा जा सकता। उत्तर प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को ही समाप्त हो चुका था।
राज्य निर्वाचन आयोग की स्थिति
सुनवाई के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग ने अदालत को अवगत कराया कि वह चुनाव कराने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक रूप से पूरी तरह तैयार है। आयोग ने 10 जून 2026 को ही अपनी संशोधित मतदाता सूची प्रकाशित कर दी थी। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से परिसीमन (Delimitation) और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हवाला देकर चुनाव को टालने की कोशिश की जा रही थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और आगामी चुनौतियां
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश में सियासी पारा चढ़ गया है। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस ने इस फैसले का स्वागत किया है। विपक्ष का आरोप है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ग्रामीण क्षेत्रों में संभावित हार के डर से जानबूझकर चुनावों को टाल रही थी। इस आदेश के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार के पास दो रास्ते बचते हैं। पहला, सरकार तय तीन महीने की समयावधि (यानी जनवरी 2027 तक) के भीतर चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराए। दूसरा, सरकार इस फैसले के खिलाफ देश की शीर्ष अदालत का रुख करे और स्टे ऑर्डर लेने की कोशिश करे। (Allahabad High Court)
2027 विधानसभा चुनावों पर असर
हाईकोर्ट द्वारा तय की गई तीन महीने की समयसीमा के कारण उत्तर प्रदेश में चुनावी कैलेंडर काफी व्यस्त होने वाला है। जनवरी 2027 तक पंचायत चुनाव कराने के ठीक बाद, राज्य में 2027 की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव भी प्रस्तावित हैं। ऐसे में प्रशासन के लिए बैक-टू-बैक दो बड़े चुनाव कराना, सुरक्षा व्यवस्था संभालना और आदर्श आचार संहिता के नियमों का पालन करना एक बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण काम होगा।
बहरहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े रुख ने यह साफ कर दिया है कि लोकतंत्र की सबसे बुनियादी इकाई यानी ‘ग्राम स्वराज’ को बिना किसी ठोस कारण के नौकरशाही या प्रशासकों के भरोसे लंबे समय तक नहीं छोड़ा जा सकता। अब सभी की नजरें राज्य सरकार के अगले कदम और निर्वाचन आयोग द्वारा जारी होने वाले विस्तृत चुनावी शेड्यूल पर टिकी हैं। (Allahabad High Court)









