देश में आये दिन कोई न कोई नया विवाद खड़ा हो जाता है। बता दें कि ये कोई राजनीतिक विवाद नहीं है। लेकिन फिर भी इसको राजनीतिक रंग देने की पूरी कोशिश की जा रही है। दरअसल देश में अरावली पहाड़ियों को बचाने को लेकर एक नई बहस छिड़ चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया एक फैसले के बाद यह मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। कोर्ट ने कहा है कि अरावली क्षेत्र में 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को जंगल के रूप में मान्यता नहीं दी जाएगी। हालांकि इस आदेश के सामने आते ही पर्यावरण विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर भी बड़ी संख्या में युवा ‘सेव अरावली’ को लेकर अभियान चला रहे हैं। इन सबके बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को सामने आकर पीसी करनी पड़ी और सारी बातों को पूरी तरह से क्लीयर करना पड़ा, जो भी अरावली को लेकर जनता और राजनीतिक पार्टियों में भ्रम था।

फैसले पर भ्रम फैलाया गया- भूपेंद्र यादव
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा- “अरावली हमारे देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला दिया जिस पर भ्रम फैलाया गया। मैंने इस फैसले को देखा, मै कहना चाहता हूं कि पीएम मोदी के नेतृत्व में अरावली की पहाड़िया और बढ़ी हैं। कोर्ट के जजमेंट में कहा गया कि अरावली को बचाने के लिए और इसे बढाने के लिए कदम उठाने चाहिए। खासतौर पर हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान में पहाड़ियां बढ़ी हैं। दिल्ली के ग्रीन बेल्ट के लिए हमने काम किया हैं।”

अरावली का पूरा विवाद क्या है?
असल में, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में अरावली क्षेत्र की लगभग 10 हजार पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा बताया था। साथ ही यह सिफारिश भी की गई थी कि इन इलाकों में खनन गतिविधियों पर रोक लगाई जानी चाहिए। इस रिपोर्ट के बाद राजस्थान की भजनलाल शर्मा की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और राज्य सरकार ने दलील ये दी कि यदि इस रिपोर्ट को पूरी तरह लागू किया गया, तो प्रदेश में चल रही अधिकतर खनन गतिविधियां बंद हो जाएंगी। राज्य सरकार के तर्क सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस पूरे मामले में नए सिरे से कानून बनाने की जरूरत है, और तब तक पुरानी व्यवस्थाओं को बनाए रखा जा सकता है।
अरावली को लेकर 100 मीटर वाला विवाद क्या है?
दरअसल, अरावली को पहचाने के लिए एक नई सीमा तय की गई है। आसान शब्दों में कहें तो अब 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली की श्रेणी में माना जाएगा। जो पहाड़ियां 100 मीटर से कम ऊंची होंगी, उन्हें जंगल के रूप में वर्ग में बांटा नहीं जाएगा। इस परिभाषा का विरोध इसलिए हो रहा है, क्योंकि आरोप है कि कई कंपनियां खनन के लिए 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को भी 60 या 80 मीटर ऊंचा बताकर रिकॉर्ड में दर्ज कर रही हैं, ताकि वहां माइनिंग की अनुमति मिल सके।

अरावली पहाड़ी कितनी जरूरी हैं?
अरावली पहाड़ियां पूरे उत्तर भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। अरावली का दक्षिण-पश्चिमी सिरा गुजरात में पालनपुर के पास स्थित है, जहां माउंट आबू मौजूद है। राजस्थान में अरावली का सबसे बड़ा हिस्सा फैला हुआ है, जो लगभग 13 से 15 जिलों जैसे उदयपुर, राजसमंद, अजमेर और जयपुर आदि को कवर करता है। राजस्थान में ही अरावली की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर है, जिसकी ऊंचाई 1,722 मीटर है। हरियाणा में अरावली की पहाड़ियां गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ तक फैली हैं। दरअसल अरावली चार राज्यों में फैली हुई है और इसके संरक्षण के लिए कई योजनाएं चलाई जाती हैं।
अरावली खतरे में तो दिल्ली पर क्या असर पड़ेगा?
जानकारों के मुताबिक, अगर अरावली को नहीं बचाया गया तो इसका असर सिर्फ पहाड़ियों तक सीमित नहीं रहेगा। पूरा इकोसिस्टम खतरे में पड़ सकता है, गर्मी और तापमान बढ़ सकता है, जल संकट गहरा सकता है, सांस संबंधी बीमारियां बढ़ेंगी और लोगों का पलायन भी हो सकता है। इसके अलावा दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण और पानी की समस्या और गंभीर हो सकती है।









