दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि इस देश में ‘जादू’ कैसे होता है? जादू ये नहीं कि कोई हाथ की सफाई दिखाए। असली जादू ये है कि कागजों पर 1 करोड़ से ज्यादा युवाओं को ‘हुनरमंद’ बना दिया गया, अरबों रुपये पानी की तरह बहा दिए गए, लेकिन जब बैंक अकाउंट चेक किए गए, तो पता चला कि 94% डेटा ही गायब है! ये मैं नहीं कह रहा, यह भारत के सबसे बड़े पहरेदार CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की ताज़ा रिपोर्ट कह रही है। तैयार हो जाइए, क्योंकि आज हम प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के उस सच का पोस्टमार्टम करेंगे जिसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे।
सबसे पहले बात करते हैं ‘डिजिटल इंडिया’ के उस दावे की, जिसकी धज्जियां खुद सरकारी आंकड़ों ने उड़ा दी हैं। CAG रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, स्किल इंडिया पोर्टल पर दर्ज 94.5% उम्मीदवारों के बैंक विवरण या तो गलत थे, या फर्जी थे! सोचिए, जिस योजना का आधार ही ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (DBT) था, वहां बैंक खातों की जगह ‘123456’ और ‘111111’ जैसे नंबर भरे हुए थे।
ये कोई छोटी गलती नहीं है! ये सीधा-सीधा इशारा है कि करोड़ों रुपये उन बेनाम, बेचेहरे लोगो के नाम पर निकाले गए जो कभी थे ही नहीं। उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान और बिहार तक, एक ही छात्र की फोटो को सैकड़ों अलग-अलग नामों के साथ चिपका दिया गया। सवाल ये उठता है कि क्या हमारे देश का युवा इतना सस्ता हो गया है कि उसकी पहचान एक कॉपी-पेस्ट’ फोटो बन गई है?
अब चलिए उन ‘स्किल सेंटर्स’ की ओर। जहां CAG की टीम ने जांच की तो उन्हें क्या मिला? ताले! बंद दरवाजे! धूल खाते कमरे! कागजों पर जहां हजारों छात्र ट्रेनिंग ले रहे थे, हकीकत में वहां गाय-भैंसें बंध रही थीं। बायोमेट्रिक हाजिरी? उसे तो ऐसे बाईपास किया गया जैसे कोई खेल हो। बिना किसी वेरिफिकेशन के सर्टिफिकेट बांटे जा रहे थे, और सबसे दर्दनाक बात? 52,000 से ज्यादा बच्चे—हाँ, बच्चे!—जो कानूनन इस योजना के पात्र ही नहीं थे, उन्हें ‘ग्रुप फार्मिंग’ और ‘कंस्ट्रक्शन’ जैसे कामों के सर्टिफिकेट थमा दिए गए।

केंद्र सरकार की इस योजना का नाम था—’कौशल विकास’। लेकिन कौशल किसका विकसित हुआ? उन प्राइवेट कंपनियों का जिन्होंने ट्रेनिंग के नाम पर सरकारी बजट डकारा! CAG कहता है कि इस देश को राजमिस्त्री, प्लंबर और लॉजिस्टिक एक्सपर्ट्स की जरूरत थी, लेकिन आपने सबसे ज्यादा सर्टिफिकेट बांटे ‘रिटेल’ और ‘कपड़े सिलाई’ में। क्यों? क्योंकि ये सिखाना आसान था, सस्ता था!
नतीजा? प्लेसमेंट रेट मात्र 41%। यानी 10 में से 6 छात्र आज भी सर्टिफिकेट हाथ में लेकर सड़क पर भटक रहे हैं। वो सर्टिफिकेट जो किसी काम का नहीं है। वो हुनर जो बाजार में बिकता ही नहीं है। क्या यह युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?”
और अब आते है उस पैसे पर जो आपके हमारे टेक्स का पैसा था।14,000 करोड़ रूपए से ज्यादा का बजट, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि लगभग 20% फंड तो राज्यों ने खर्च ही नहीं किया। और जो खर्च हुआ, उसका हिसाब मांगने पर सन्नाटा छा जाता है। 24 करोड़ तो सिर्फ एडमिनिस्ट्रेटिव खर्चों में ‘ओवरचार्ज’ कर दिए गए। लाखों छात्रों का वजीफा (Stipend) आज भी सरकारी फाइलों में दबा हुआ है। छात्र इंतज़ार कर रहा है और सिस्टम सो रहा है।

दोस्तों, CAG की यह रिपोर्ट सिर्फ पन्नों का पुलिंदा नहीं है, यह एक चेतावनी है। यह रिपोर्ट चीख-चीख कर कह रही है कि ‘स्किल इंडिया’ केवल एक ‘सर्टिफिकेट बांटो अभियान’ बनकर रह गया है। अगर डेटा फर्जी है, अगर सेंटर बंद हैं, अगर नौकरियां नहीं हैं, तो फिर ये हजारों करोड़ गए कहाँ? और सबसे बडी बात ये कि कौशल विकास के नाम पर जो बंदरबांट हुई है उसके असली गुनहगार कौन हैं कौन है जिनकी जेबें इन पैसो से भरी गई। उम्मीद है कि रिपोर्ट आने के बाद इसकी भी गहराई से जांच होगी और तब पता चलेगा कि इस कौशल विकास मिशन में असली विकास आखिर हुआ किसका।
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