दुनिया के नक्शे पर एक ऐसा मुल्क, जिसके सीने में सऊदी अरब से भी ज्यादा तेल दफन है, आज बारूद के ढेर पर बैठा है। वेनेजुएला—जो कभी अमीरी में दुनिया के चौथे नंबर पर था, जहाँ के लोग लंच के बाद शॉपिंग करने फ्लाइट से मियामी जाया करते थे—आज उसी वेनेजुएला की सड़कों पर भूख का नंगा नाच और आसमान में अमेरिकी फाइटर जेट्स की गूंज है।
आज जब वेनेजुएला के आसमान में अमेरिकी फाइटर जेट्स की गूंज है और गलियों में भूख से बेहाल लोग हैं, तो पूरी दुनिया के जेहन में एक ही सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ और क्यू की जनता त्राहिमाम पर उतर आई है। क्या आप जानते है कि, वेनेजुएला की सबसे बड़ी ताकत ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। देश की अर्थव्यवस्था का 95% हिस्सा केवल तेल निर्यात पर निर्भर हो गया। जब तक तेल की कीमतें आसमान पर थीं, सब कुछ सुनहरा था। लेकिन सरकार ने दूसरे उद्योगों (खेती, मैन्युफैक्चरिंग) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि देश सुई से लेकर दवाइयों तक, हर छोटी चीज के लिए आयात (Import) पर निर्भर हो गया।

सबसे पहली गलती यह हुई कि पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के दौर में ‘बोलिवेरियन क्रांति’ के नाम पर सरकारी खजाने को दोनों हाथों से लुटाया गया। गरीबों को खुश करने के लिए भारी सब्सिडी दी गई, लेकिन इसके लिए कोई ठोस आर्थिक ढांचा तैयार नहीं किया गया। जब 2014 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरीं, तो वेनेजुएला का ‘फ्री मॉडल’ ताश के पत्तों की तरह ढह गया।
दूसरा बड़ा कारण यह कि सरकार ने निजी कंपनियों और विदेशी तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण (Nationalization) कर दिया। अकुशल सरकारी अधिकारियों को बड़ी कंपनियों की कमान सौंप दी गई। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकारी तेल कंपनी PDVSA में भ्रष्टाचार बढ़ गया और उत्पादन गिरता चला गया। जो मशीनें तेल निकालती थीं, उनके रखरखाव के लिए भी पैसे नहीं बचे।
और तीसरा सबसे बड़ा कारण यह कि निकोलस मादुरो की सरकार ने आर्थिक संकट से निपटने के लिए अंधाधुंध नोट छापे। इसका परिणाम यह हुआ कि देश ‘हाइपर-इन्फ्लेशन’ की चपेट में आ गया। महंगाई दर लाखों फीसदी बढ़ गई। आज स्थिति यह है कि एक कॉफी के कप की कीमत करोड़ों बोलिवर (वहां की मुद्रा) में है, जिससे लोगों की जीवनभर की बचत मिट्टी में मिल गई।

इन्हीं सब कारणों से ये देश अर्श से फर्श पर आ गिरा जिसका परिणाम यह हुआ कि, अमेरिका ने मादुरो सरकार पर लोकतंत्र को कुचलने का आरोप लगाते हुए कड़े आर्थिक प्रतिबंध (Sanctions) लगा दिए। इससे वेनेजुएला के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल बेचना लगभग नामुमकिन हो गया। आज जब अमेरिका ने सीधी सैन्य कार्रवाई की है, तो रूस और चीन जैसे देशों के हस्तक्षेप ने इस आर्थिक संकट को अब वैश्विक युद्ध की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।
आपको बताते चलें कि बीती रात अमेरिकी वायुसेना ने वेनेजुएला के सामरिक ठिकानों पर भीषण हवाई हमले किए। इस सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। खबर है कि इन हमलों के बाद वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में ले लिया गया है। वाशिंगटन का कहना है कि यह ‘लोकतंत्र की बहाली’ के लिए जरूरी था, लेकिन इस कदम ने तीसरे विश्व युद्ध की चिंगारी सुलगा दी है।

जहां अमेरिकी कार्रवाई पर ड्रैगन यानी चीन ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया है। बीजिंग ने एक आधिकारिक बयान जारी कर इसे “अंतरराष्ट्रीय दादागिरी” करार दिया है। चीन ने चेतावनी दी है कि अमेरिका खुद को ‘दुनिया का थानेदार’ समझना बंद करे। वेनेजुएला में चीन के अरबों डॉलर का निवेश लगा है, और वह इसे डूबते हुए चुपचाप नहीं देखेगा। तो वहीं रूस के राष्ट्रपति कार्यालय (क्रेमलिन) से आई प्रतिक्रिया ने माहौल को और भी तनावपूर्ण बना दिया है। रूस ने अमेरिका को सीधे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है कि:
”निकोलस मादुरो को तुरंत रिहा किया जाए। किसी संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति पर इस तरह का हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अमेरिका आग से खेल रहा है।”
एक तरफ अमेरिका अपनी सैन्य ताकत दिखा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस और चीन की जुगलबंदी ने वाशिंगटन की नींद उड़ा दी है। वेनेजुएला अब केवल एक देश नहीं, बल्कि महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की जंग का अखाड़ा बन चुका है।









