5 साल का लंबा इंतजार, दलीलों का दौर, लेकिन नतीजा वही ‘नो रिलीफ’। सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को ‘मास्टरमाइंड’ की श्रेणी में रखते हुए बाहर आने का रास्ता बंद कर दिया है। क्या दिल्ली दंगों की साजिश की कड़ियां अब और कसने वाली हैं?
2020 के दिल्ली दंगों की ‘बड़ी साजिश’ (Larger Conspiracy Case) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है, जबकि इसी मामले में 5 अन्य आरोपियों को राहत देते हुए उन्हें जमानत दे दी है। कोर्ट ने दंगों के 5 आरोपियों को 12 शर्तों के साथ जमानत दी गई है। दिल्ली में दंगे भड़काने में उमर खालिद और शरजील इमाम का हाथ सामने आया है।
2 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व छात्र नेताओं की जमानत खारिज कर दी थी, जिसके बाद सभी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 10 दिसंबर 2025 को मामले पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष (दिल्ली पुलिस) की ओर से रिकॉर्ड पर रखे गए सबूतों के लिहाज से उमर खालिद(Umar Khalid) और शरजील इमाम (Sharjeel Imam) की स्थिति अन्य 5 आरोपियों की तुलना में अलग है। कथित अपराधों में इन दोनों की भूमिका केंद्रीय (मुख्य) रही है। इन दोनों की हिरासत (ज्यूडिशियल कस्टडी) की अवधि भले ही लंबी रही हो, लेकिन यह न तो संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती है और न ही संबंधित कानूनों के तहत लगे वैधानिक प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करती है।
बहस के दौरान बचाव पक्ष ने (आरोपियों ने) लंबे समय तक जेल में रहने और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के बारे में दलीलें दी थीं। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था पर विचार करना, ट्रायल शुरू होने से पहले आरोपियों को लंबे समय तक जेल में रखने के मामले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) संवैधानिक व्यवस्था में एक खास जगह रखता है। लेकिन ट्रायल से पहले जेल को सजा नहीं माना जा सकता. स्वतंत्रता से वंचित करना मनमाना नहीं होगा। यूएपीए एक खास कानून के तौर पर उन शर्तों के बारे में एक कानूनी रास्ता दिखाता है जिनके आधार पर ट्रायल से पहले जमानत दी जा सकती है।’
इन्हें मिली जमानत:
कोर्ट ने इसी मामले में बंद गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को सशर्त जमानत दे दी है।
भविष्य की उम्मीद:
अदालत ने उमर और शरजील को राहत देते हुए यह भी कहा कि वे एक साल बाद या ‘प्रोटेक्टेड विटनेस’ (सुरक्षित गवाहों) की गवाही पूरी होने के बाद फिर से निचली अदालत में जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं।
पुलिस की दलील:
दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि ये दंगे महज विरोध नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता पर हमला और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को बदनाम करने की सोची-समझी साजिश थी।










