साल 2026 की शुरुआत के साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति को विस्तारवाद (Expansionism) की ओर मोड़ दिया है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी विशेष बलों द्वारा पकड़े जाने के बाद से ही व्हाइट हाउस का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है। अब ट्रंप का अगला निशाना आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ‘ग्रीनलैंड’ (Green Land) है। ट्रंप का मानना है कि रूस (Russia) और चीन (China) इस रणनीतिक द्वीप पर नजर गड़ाए हुए हैं, और यदि अमेरिका (America) ने इसे नहीं लिया, तो उसके दुश्मन उसके पड़ोस में आकर बैठ जाएंगे। डेनमार्क (Denmark) द्वारा इस द्वीप को बेचने से इनकार करने के बाद ट्रंप ने अब सीधे ‘सैन्य विकल्प’ और ‘नाटो (NATO)’ को खत्म करने की धमकी दे डाली है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald trump) ने एक बार फिर अपने पुराने और सबसे विवादित एजेंडे को मेज पर पटक दिया। ट्रंप अब केवल अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं, बल्कि एक ऐसे ‘ग्लोबल हंटर’ की तरह बर्ताव कर रहे हैं जो दुनिया का भूगोल बदलने पर आमादा है। उनका ताजा निशाना है— ग्रीनलैंड।
फिलहाल ट्रंप ने साफ कर दिया है कि वे किसी के सामने झुकने या किसी की इजाजत लेने के मूड में नहीं हैं। उनके तेवर बता रहे हैं कि अब दुनिया को ट्रंप की शर्तों पर ही चलना होगा। ट्रंप ने डेनमार्क की भूमिका को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि अब पुरानी संधियों का दौर खत्म हुआ। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया, तो वहां रूस या चीन अपना झंडा गाड़ देंगे। आपको बता दें कि, आर्कटिक द्वीप पर अमेरिका का कब्जा अब चर्चा का विषय नहीं, बल्कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक ‘अनिवार्य मिशन’ है।

ट्रंप ने साफ तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि, अमेरिका अब उन देशों का ‘मुफ्त बॉडीगार्ड’ नहीं बनेगा जो अपनी सुरक्षा के लिए पैसे नहीं खर्च करते। उन्होंने संकेत दिया कि अगर NATO के सदस्य देश तुरंत अपना रक्षा बजट नहीं बढ़ाते और अमेरिका की शर्तों को नहीं मानते, तो अमेरिका इस गठबंधन को इतिहास की कूड़ेदानी में फेंकने से भी नहीं हिचकिचाएगा।
आपको बताते चलें कि ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ का टुकड़ा नहीं, बल्कि दुनिया के नए व्यापारिक रास्तों और प्राकृतिक संसाधनों की चाबी है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस चाबी को किसी भी कीमत पर हासिल करेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें पूरी दुनिया से ही क्यों न भिड़ना पड़े। ट्रंप के इन बयानों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर खलबली मचा दी है। डेनमार्क के नेतृत्व से लेकर यूरोपीय संघ के देशों तक, हर कोई इस सोच में डूबा है कि ‘ट्रंप 2.0’ के इस तूफान को कैसे रोका जाए। लेकिन ट्रंप के मिजाज से लगता है कि वे अब किसी को बक्शने के मूड में नहीं हैं।









