Chabahar political row: राजनीति में जब ‘बंदरगाह’ (Port) की बात आती है, तो तूफान उठना लाजिमी है। ईरान का चाबहार पोर्ट, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से ‘सोने की चाबी’ माना जाता है, अब देश के भीतर ही एक ‘सियासी अखाड़ा’ बन गया है। कांग्रेस ने बड़ा आरोप लगाया है कि भारत ने इस पोर्ट से अपना कंट्रोल खो दिया है, वहीं विदेश मंत्रालय (MEA) इस दावे को सिरे से खारिज कर ‘डिप्लोमेसी’ की ढाल लेकर खड़ा है।
आपको बता दें, कांग्रेस का सीधा हमला है कि सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में आकर घुटने टेक दिए और देश के ₹1100 करोड़ पानी में बहा दिए। लगता है दिल्ली की फाइलों में चाबहार का रास्ता अब वाशिंगटन से होकर गुजरता है। क्या हमारे रणनीतिक हित इतने कच्चे हैं कि सात समंदर पार से एक फोन कॉल आया और हमने ‘कंट्रोल’ का रिमोट ही पकड़ा दिया? (Chabahar political row)
Chabahar political row: ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाम ‘प्रेशर डिप्लोमेसी
जब विपक्ष ने हल्ला बोला, तो विदेश मंत्रालय ने अपनी सधी हुई भाषा में ‘इनकार’ का सर्टिफिकेट जारी कर दिया। मंत्रालय का कहना है कि चाबहार पर भारत का दबदबा कायम है और रणनीतिक साझेदारी में कोई बदलाव नहीं हुआ है। फिलहाल अब जनता के सामने सवाल यह है कि अगर सब कुछ ‘कंट्रोल’ में है, तो इस पोर्ट की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है? क्या यह ‘डिप्लोमेटिक चुप्पी’ किसी बड़े तूफान के आने की आहट है?
आपको बता दें कि, चाबहार केवल एक पोर्ट नहीं है, यह पाकिस्तान को धता बताकर अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने का भारत का अपना ‘शॉर्टकट’ है। और अगर इस पोर्ट पर भारत की पकड़ ढीली होती है, तो यह केवल पैसों की बर्बादी नहीं, बल्कि भारत की ‘रीजनल पावर’ पर एक करारा प्रहार होगा। (Chabahar political row)
एक तरफ ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा है, और दूसरी तरफ विपक्ष को ‘प्रेशर डिप्लोमेसी’ का डर। सच इन दोनों के बीच कहीं फंसा है। क्या चाबहार वाकई भारत की ‘शान’ बनेगा या वैश्विक ताकतों के बीच एक ‘पॉलिटिकल फुटबॉल’ बनकर रह जाएगा?









