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‘परेशान करो, राज्य छोड़ने पर मजबूर करो’: CM हिमंत सरमा के ‘मिया’ विरोधी बयान से देश में उबाल, क्या यह लोकतंत्र का अंत है?

CM Himanta Biswa Sarma

CM Himanta Biswa Sarma: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बार फिर अपने बयानों से देश की राजनीति में ‘नफरत का बारूद’ भर दिया है। एक सार्वजनिक मंच से मिया समुदाय (बंगाली भाषी मुसलमान) के खिलाफ दिए गए उनके विवादित बयान ने न केवल असम, बल्कि पूरे देश को हिलाकर रख दिया है।

मुख्यमंत्री ने खुलेआम आह्वान करते हुए कहा कि मिया समुदाय के लोगों को उनके रोजमर्रा के कामों में “परेशान किया जाए”। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि— “अगर वे 10 मांगें, तो उन्हें केवल 4 ही दो। उन्हें इतना तंग करो कि वे राज्य छोड़ने को मजबूर हो जाएं।”

भारतीय संविधान की मूल भावना का उल्लंघन (CM Himanta Biswa Sarma)

राजनीतिक विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों का मानना है कि एक मुख्यमंत्री द्वारा किसी विशेष समुदाय के बहिष्कार की बात करना सीधे तौर पर भारतीय संविधान की मूल भावना (Article 14 और 21) का उल्लंघन है। मुख्यमंत्री का यह बयान आम जनता को कानून हाथ में लेने और एक विशेष समुदाय के खिलाफ हिंसा या भेदभाव करने के लिए उकसाने जैसा है।

इस तरह के विभाजनकारी बयान देश के भीतर आंतरिक गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं, जो भारत की अखंडता और ‘देशहित’ के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इसलिए भारत जो दुनिया भर में ‘लोकतंत्र की जननी’ के रूप में जाना जाता है, वहां एक मुख्यमंत्री का ऐसा ‘नस्लभेदी’ बयान वैश्विक मंच पर देश की छवि को धूमिल कर रहा है। (CM Himanta Biswa Sarma)

मुस्लिम समाज और नागरिक अधिकार संगठनों में नाराजगी

वहीं इस बयान के बाद मुस्लिम समाज और नागरिक अधिकार संगठनों में नाराजगी की लहर दौड़ गई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद और अन्य संगठनों ने इसे “राज्य प्रायोजित भेदभाव” करार दिया है। उनका कहना है कि यह बयान समुदायों के बीच नफरत की दीवार खड़ी कर रहा है। असम के कई इलाकों में मिया समुदाय के लोग डरे हुए हैं। व्यापार, मजदूरी और दैनिक कामकाज करने वाले लोगों को अब अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। (CM Himanta Biswa Sarma)

मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग

विपक्षी दलों ने इस बयान पर कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की है। विपक्ष का सवाल है कि क्या कोई मुख्यमंत्री अपनी शपथ को भूलकर इस तरह की ‘अलोकतांत्रिक’ भाषा का प्रयोग कर सकता है? क्या यह बयान देश की शांति भंग करने की एक सोची-समझी साजिश है?

आपको बता दें कि, राष्ट्रवाद का असली अर्थ देश के हर नागरिक की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना है। जब सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति ‘परेशान करने’ की बात करता है, तो वह केवल एक समुदाय को नहीं, बल्कि देश के लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था को कमजोर करता है। सवाल यह है कि क्या सत्ता की भूख इतनी बढ़ गई है कि अब भाईचारे की बलि चढ़ाना अनिवार्य हो गया है? (CM Himanta Biswa Sarma)

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