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लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, 118 सांसदों ने स्पीकर के खिलाफ खोला मोर्चा!

Om Birla

लोकसभा में उस वक्त सियासी सरगर्मी बढ़ गई जब विपक्ष ने एकजुट होकर स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का ऐलान कर दिया। मंगलवार को कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई की अगुआई में 118 सांसदों के हस्ताक्षर वाला एक नोटिस लोकसभा सचिवालय को सौंपा गया। इस प्रस्ताव में कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी, डीएमके और कई अन्य विपक्षी दल शामिल हैं, हालांकि ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी (TMC) ने इस बार खुद को इस प्रस्ताव से अलग रखा है। विपक्ष का मुख्य आरोप है कि सदन के भीतर विपक्षी नेताओं की आवाज़ दबाई जा रही है और उन्हें महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा है, जबकि सत्तापक्ष को पूरी छूट मिली हुई है।

क्यों नाराज है विपक्ष? विवाद की असली वजह

विपक्ष की इस नाराजगी के पीछे हाल की कई घटनाएं शामिल हैं। दरअसल, 2 फरवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे के संस्मरण से जुड़ा एक मुद्दा उठाना चाहते थे, जिसकी अनुमति उन्हें नहीं मिली। इसके अलावा, सदन की अवमानना के आरोप में आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित किए जाने के फैसले ने आग में घी डालने का काम किया। विपक्षी सांसदों का कहना है कि सदन में निष्पक्षता की कमी है और इसी गतिरोध के चलते उन्होंने अब सीधे स्पीकर को ही हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

क्या है स्पीकर को हटाने की कानूनी प्रक्रिया?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 और लोकसभा नियमों के अनुच्छेद 200 के तहत स्पीकर को हटाने का प्रावधान है। इसके लिए एक स्पष्ट नोटिस देना होता है जिसमें स्पीकर पर लगे आरोपों का साफ-साफ जिक्र हो। नोटिस मिलने के बाद लोकसभा सचिवालय को 14 दिनों के भीतर चर्चा के लिए दिन तय करना होता है। सदन में इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जरूरी है, जो कि मौजूदा मामले में विपक्ष के पास पहले से मौजूद है।

क्या गिर जाएगी ओम बिरला की कुर्सी?

प्रक्रिया के मुताबिक, स्पीकर को तभी पद से हटाया जा सकता है जब लोकसभा में इसके पक्ष में बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए। मौजूदा गणित को देखें तो सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के पास सदन में स्पष्ट बहुमत है। ऐसे में विपक्षी सांसदों के एकजुट होने के बावजूद इस प्रस्ताव के पास होने की संभावना बेहद कम नजर आ रही है। हालांकि, विपक्ष का यह कदम सरकार और स्पीकर पर नैतिक दबाव बनाने और जनता के बीच ‘पक्षपात’ का मुद्दा ले जाने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

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