लखनऊ: उत्तर प्रदेश के विधानभवन में जब वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने अपना लाल ब्रीफकेस खोला, तो वह केवल 9,12,696 करोड़ रुपये का लेखा-जोखा नहीं था, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए बिछाई गई एक रणनीतिक बिसात थी। योगी सरकार का यह ‘मगा बजट’ पिछले साल के मुकाबले 13% बड़ा है। जानकार इसे 2024 के लोकसभा नतीजों के बाद बीजेपी की ‘वोट बैंक इंजीनियरिंग’ का मास्टर प्लान मान रहे हैं। एक तरफ सरकार इसे ‘सपनों का यूपी’ बनाने वाला बजट कह रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष ने इसे ‘लूट का बजट’ और ‘रेत का टीला’ करार दिया है।
युवा, महिला और किसान: 2024 की चोट पर 2027 का मरहम?
2024 के चुनाव परिणामों ने सत्ता पक्ष को यह संकेत दे दिया था कि युवाओं की नाराजगी और किसानों का दर्द चुनावी नतीजों को बदल सकता है। इसी को साधने के लिए सरकार ने तीन बड़े हथियार चलाए हैं:
- युवा शक्ति और डिजिटल गाजर: ‘पेपर लीक’ और नौकरियों की सुस्ती से उपजे गुस्से को कम करने के लिए सरकार अब ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान’ के जरिए बिना ब्याज और गारंटी के लोन दे रही है। इसके अलावा 40 लाख स्मार्टफोन और टैबलेट बांटने की योजना को विपक्ष युवाओं के हाथ में ‘डिजिटल गाजर’ थमाना बता रहा है।
- आधी आबादी का भरोसा: मेधावी छात्राओं को ‘रानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना’ और वर्किंग वूमेन हॉस्टल्स का जाल बिछाना सीधे तौर पर महिला वोटरों को सुरक्षित करने की कोशिश है।
- पश्चिमी यूपी का किसान बेल्ट: गन्ने के दाम में ₹30 की वृद्धि और मुफ्त बिजली के जरिए सरकार उस किसान बेल्ट को वापस पाने की कोशिश में है जिसने पिछले चुनाव में पसीने छुड़ा दिए थे।
विपक्ष का प्रहार: “अगर सब चंगा है, तो पलायन क्यों?”
बजट पेश होते ही विपक्ष ने तीखे तेवर अपना लिए हैं। समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव ने इसे भ्रष्टाचार में लिप्त और जनता को लूटने वाला बजट बताया। वहीं सपा विधायक आरके वर्मा ने पलायन का मुद्दा उठाते हुए चुभता हुआ सवाल किया— “अगर यूपी की इकोनॉमी 30 लाख करोड़ की है, तो यहाँ का नौजवान दूसरे राज्यों में मजदूरी क्यों कर रहा है?” कांग्रेस नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ ने इसे ‘दिशाहीन और खोखला’ करार देते हुए कहा कि जब तक किसान खाद के लिए लाठियां खाएगा, तब तक ये 9 लाख करोड़ सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाएंगे। विपक्ष का आरोप है कि इतने बड़े बजट के बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र में SGPGI या AIIMS जैसे किसी बड़े संस्थान की घोषणा नहीं की गई है।
दावों की चमक बनाम जमीनी हकीकत
9.12 लाख करोड़ की यह रकम इतनी बड़ी है कि उत्तर प्रदेश की शक्ल बदल सकती है, लेकिन असली सवाल क्रियान्वयन (Implementation) का है। क्या यह पैसा उस गरीब किसान तक पहुँचेगा जो खाद की बोरी के लिए लाइन में खड़ा है? सत्ता पक्ष के लिए यह बजट उनकी ‘साख’ का सवाल है, वहीं विपक्ष के लिए यह उनके ‘अस्तित्व’ की लड़ाई है।
2027 की जंग अब विकास के आंकड़ों बनाम आम आदमी की जेब के बीच लड़ी जाएगी। अंततः, जनता यह तय करेगी कि यह बजट उनके घर के हालात बदलने वाला ‘ब्रह्मास्त्र’ था या सिर्फ चुनाव से पहले दीवार पर चिपकाया गया एक ‘चमकीला पोस्टर’।









