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UP विधानसभा में ‘महाभारत’: बेरोजगारी और आरक्षण पर भिड़े सत्ता-विपक्ष, हंगामे के बीच अध्यक्ष ने छोड़ी कुर्सी

विधानसभा

लखनऊ डेस्क: उत्तर प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र इस समय किसी सियासी अखाड़े से कम नजर नहीं आ रहा है। सदन में बेरोजगारी और आरक्षण के मुद्दे पर माहौल इतना गरमा गया कि तीखी नोकझोंक और नारेबाजी के बीच विधानसभा अध्यक्ष को कुछ देर के लिए अपनी कुर्सी तक छोड़नी पड़ी। विपक्ष ने सरकार को आंकड़ों के जाल में घेरने की कोशिश की, तो वहीं सत्ता पक्ष ने भी 2017 के बाद की उपलब्धियां गिनाकर पलटवार किया। सदन के भीतर की यह तल्खी साफ संकेत दे रही है कि 2027 के चुनाव से पहले कोई भी दल पीछे हटने को तैयार नहीं है।

नौकरी और आरक्षण पर रागिनी सोनकर का तीखा प्रहार

सदन की कार्यवाही के दौरान सपा विधायक डॉ. रागिनी सोनकर ने बेरोजगारी का मुद्दा उठाते हुए सरकार की घेराबंदी की। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि प्रदेश का युवा आज भविष्य को लेकर अनिश्चित और बेचैन है। रागिनी ने सवाल उठाया कि “परीक्षाएं होती हैं तो रिजल्ट नहीं आता, रिजल्ट आता है तो नियुक्ति के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है। आखिर कब तक युवा इन अनिश्चितताओं के बीच रहेगा?” उन्होंने भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी और आरक्षण के नियमों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए सरकार से एक स्पष्ट ‘टाइमलाइन’ की मांग की।

सरकार का जवाब: 47 हजार नियुक्तियां और भर्ती कैलेंडर का दावा

विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने आंकड़ों की ढाल सामने रखी। उन्होंने बताया कि 2017 के बाद से अब तक 47,000 से ज्यादा नियुक्तियां की जा चुकी हैं और हर भर्ती में आरक्षण के नियमों का पूरी तरह पालन हुआ है। उन्होंने सदन को जानकारी दी कि यूपीपीएससी (UPPSC) और एसएससी (SSC) का पूरा भर्ती कैलेंडर जारी हो चुका है, जिसमें 2026 की परीक्षाओं की रूपरेखा भी तय है। हालांकि, विपक्ष इन आंकड़ों से संतुष्ट नहीं हुआ और “आंकड़े नहीं, हकीकत देखो” के नारों से सदन गूंज उठा।

कानून व्यवस्था और शंकराचार्य विवाद पर बढ़ा टकराव

बेरोजगारी के बाद सदन में कानून व्यवस्था का मुद्दा भी गरमाया। विपक्ष ने प्रयागराज में खटिक समाज के बच्चों की मौत, सरधना की हत्याओं और अपहरण की घटनाओं को लेकर सरकार को घेरा। संसदीय कार्य मंत्री ने इन सभी मामलों में त्वरित कार्रवाई और आर्थिक सहायता का ब्यौरा दिया, लेकिन विपक्ष ने इसे ‘संवेदनहीनता’ करार देते हुए सदन से बहिर्गमन (Walkout) कर दिया। इसके अलावा, शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ माघ मेले में हुए कथित अभद्र व्यवहार का मुद्दा भी छाया रहा। जहाँ विपक्ष ने इसे अपमान बताया, वहीं सत्ता पक्ष ने 2015 में सपा सरकार के दौरान उन पर हुए लाठीचार्ज की याद दिलाकर पलटवार किया।

निष्कर्ष: सियासी संग्राम या समाधान?

बेरोजगारी, आरक्षण, कानून व्यवस्था और धार्मिक सम्मान—ये चार ऐसे धागे हैं जिन्होंने सदन की बहस को एक बड़े सियासी ‘चक्रव्यूह’ में बदल दिया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष बेवजह माहौल खराब कर रहा है, जबकि विपक्ष का दावा है कि सरकार आंकड़ों के पीछे अपनी नाकामियां छिपा रही है। अब सबकी नजरें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संबोधन पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मुख्यमंत्री के जवाब से विपक्ष शांत होगा या फिर यह सियासी संग्राम विधानसभा की दहलीज लांघकर सीधे वोटरों के बीच और तेज होगा।

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