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केशव प्रसाद मौर्य: संघर्ष से सत्ता के शिखर तक; यूपी बीजेपी के वो ‘चाणक्य’ जिन्होंने बदल दी सियासत की दिशा

केशव

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी पिछड़ों की गोलबंदी और संगठन की मजबूती की बात होती है, तो एक नाम सबसे प्रमुखता से उभरता है— केशव प्रसाद मौर्य। सिराथू की गलियों से निकलकर लखनऊ के सत्ता के गलियारों तक का उनका सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। वह केवल एक उपमुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि बीजेपी के लिए एक ऐसे रणनीतिकार हैं जिन्होंने 2017 में वनवास काट रही भाजपा को प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता की दहलीज तक पहुँचाया था।

शुरुआती सफर: चाय की दुकान से राजनीति के मैदान तक

केशव प्रसाद मौर्य का जन्म कौशांबी जिले के एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके संघर्ष के दिनों की कहानी आज भी कार्यकर्ताओं को प्रेरित करती है; उन्होंने अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए चाय तक बेची और अखबार भी बांटे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के साथ जुड़कर उन्होंने राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की नींव पड़ी, जहाँ उन्होंने संगठन की बारीकियों को सीखा।

2017 का वो ‘मैजिक’: जब केशव बने बीजेपी का चेहरा

केशव प्रसाद मौर्य के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साल 2016 था, जब उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। उस वक्त बीजेपी को एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो गैर-यादव ओबीसी वोटों को एकजुट कर सके। केशव ने अपनी ‘परिवर्तन यात्राओं’ के जरिए पूरे प्रदेश को मथ डाला। नतीजा यह हुआ कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। हालांकि, वह खुद मुख्यमंत्री नहीं बने, लेकिन उपमुख्यमंत्री के तौर पर सरकार और संगठन के बीच की सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरे।

2027 की तैयारी: केशव मौर्य की अहमियत

जैसे-जैसे 2027 के चुनाव करीब आ रहे हैं, केशव प्रसाद मौर्य की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होती जा रही है। बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व जानता है कि यूपी में पिछड़ा वर्ग और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को जोड़ने की क्षमता केशव में कूट-कूट कर भरी है। वह अक्सर विपक्षी गठबंधन (I.N.D.I.A.) और समाजवादी पार्टी के ‘PDA’ फॉर्मूले के खिलाफ बीजेपी के सबसे बड़े रक्षक के तौर पर खड़े नजर आते हैं।

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