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‘नाड़ा खींचना, ब्रेस्ट पकड़ना रेप की कोशिश…’,  सुप्रीम कोर्ट ने पलटा इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला

Allahabad High Court

Allahabad High Court: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मार्च 2025 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें दो आरोपियों के खिलाफ बलात्कार के प्रयास के आरोपों को कम गंभीर अपराध में बदल दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय ने महिला के स्तन पकड़ने, उसके पायजामे की डोरी तोड़ने और उसे नाले के नीचे घसीटने के कथित कृत्यों को बलात्कार करने के ‘प्रयास’ के बजाय केवल ‘तैयारी’ के रूप में गलत तरीके से माना था।

यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता: सुप्रीम कोर्ट (Allahabad High Court)

ऐसा करते हुए, शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील को भी स्वीकार कर लिया है और दोनों आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 376 के साथ POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत बलात्कार के प्रयास के आरोप में विशेष न्यायाधीश (POCSO) कासगंज द्वारा जारी मूल समन को बहाल कर दिया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और एनवी अंजारी की पीठ ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित करने को कहा है, ताकि यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों से निपटते समय न्यायाधीशों और न्यायिक प्रक्रियाओं में “संवेदनशीलता और करुणा पैदा करने” के उद्देश्य से मसौदा दिशानिर्देश तैयार किए जा सकें। (Allahabad High Court)

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायालय ने कहा कि समिति को यह कार्य तीन महीने के भीतर पूरा करना होगा। बलात्कार के प्रयास के मामले के संबंध में, शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय से असहमति जताते हुए कहा कि तथ्यात्मक आरोप तैयारी से कहीं अधिक थे। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की, “इन आरोपों को सरसरी तौर पर देखने से इस बात में जरा भी संदेह नहीं रह जाता कि आरोपी व्यक्तियों ने पूर्व नियोजित इरादे से उस पर आईपीसी की धारा 376 के तहत अपराध करने की कोशिश की।” (Allahabad High Court)

अदालत ने बताया कि आरोपी ने कथित तौर पर नाबालिग पीड़िता को घर छोड़ने के बहाने मोटरसाइकिल पर बिठाया, एक पुलिया के पास रोका, उसे घसीटा और उसके साथ यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता की चीखें सुनकर गवाहों के मौके पर पहुंचने के कारण अपराध आगे नहीं बढ़ पाया। कोर्ट ने कहा, “हम उच्च न्यायालय के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हो सकते कि आरोप केवल बलात्कार के अपराध को अंजाम देने की तैयारी के बराबर हैं, न कि प्रयास के।”

वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता के माध्यम से ‘वी द वुमेन ऑफ इंडिया’ नाम के एक संगठन से 20 मार्च, 2025 को एक पत्र मिलने के बाद न्यायालय ने इस मामले को खुद संज्ञान में लिया था, जिसमें उच्च न्यायालय के तर्क को “कानूनी रूप से गलत, असंवेदनशील, गैर-जिम्मेदार और महिलाओं और कमजोर व्यक्तियों की सुरक्षा के प्रयासों को हतोत्साहित करने की संभावना” के रूप में प्रश्न उठाया गया था। (Allahabad High Court)


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