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बिहार का ‘डिग्री दंगल’! मंत्री जी की पीएचडी पर सियासी रार, क्या वाकई ‘अशोक’ होंगे अमर या फंसेंगे फेर में?

Bihar Politics

Bihar Politics: बिहार की सियासत में इन दिनों विकास की बातों से ज्यादा ‘डिग्रियों’ की चर्चा है। मामला मुख्यमंत्री के करीबी और कैबिनेट मंत्री डॉ. अशोक चौधरी का है। जैसे ही खबर आई कि मंत्री जी अब ‘असिस्टेंट प्रोफेसर’ की कुर्सी संभालने की तैयारी में हैं, विपक्ष ने अपनी ‘सियासी दूरबीन’ निकाल ली और उनकी डिग्री की बारीकियों की जांच शुरू कर दी।

Bihar Politics: विकास की बातों पर भारी ‘डिग्री’ का विवाद

राजद (RJD) ने मोर्चा संभालते हुए सीधे आरोप लगाया कि मंत्री जी की डिग्री में भारी झोल है। पार्टी के प्रवक्ताओं ने इसे “फर्जीवाड़ा” करार देते हुए पूछा— “जब मंत्री जी राजनीति में चौबीस घंटे व्यस्त थे, तब उन्होंने पीएचडी की क्लास कब ली और रिसर्च पेपर कब लिखे?” राजद का तंज है कि बिहार में डिग्रियां अब शायद ‘होम डिलीवरी’ पर मिलने लगी हैं। तो वहीं कांग्रेस ने हमला बोलते हुए पूछा है कि, अशोक चौधरी की पीएचडी “बेहद संदिग्ध” है। क्या यह “डिग्री असली है या सिर्फ सियासत की थाली में सजाया गया एक नया पकवान?

​इन तमाम आरोपों के बीच डॉ. अशोक चौधरी भी चुप नहीं बैठे। उन्होंने अपनी डिग्रियों को पूरी तरह ‘क्लीन’ बताते हुए विपक्ष को आईना दिखाया है। उनके समर्थकों का कहना है कि विपक्ष की आंखों में जलन इसलिए है क्योंकि एक पढ़ा-लिखा नेता अब छात्रों को भी पढ़ाएगा। (Bihar Politics)

फिलहाल, यह बात तो सच है कि ‘सीखने और पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती’; ज्ञान तो वह मशाल है जो जीवन के किसी भी पड़ाव पर दिशा दिखा सकती है। एक राजनेता का अकादमिक क्षेत्र में रुचि लेना स्वागत योग्य कदम हो सकता है, लेकिन असली विवाद ‘इरादे’ पर नहीं, बल्कि ‘प्रक्रिया’ पर है।

​जब बिना किसी लंबी प्रैक्टिस, बिना कड़े प्रशिक्षण और वर्षों के शोध अनुभव के सीधे ‘असिस्टेंट प्रोफेसर’ जैसे गरिमामयी और तकनीकी पद पर बैठने की तैयारी हो, तो जनता और विपक्ष का सवाल पूछना लाजमी बन जाता है। क्या यह वाकई शिक्षा के प्रति प्रेम है, या फिर सत्ता के रसूख का इस्तेमाल कर एक नई ‘कुर्सी’ सुरक्षित करने की कोशिश? (Bihar Politics)

​बिहार की जनता अब देख रही है कि आने वाले दिनों में यह विवाद शांत होता है या फिर ‘डिग्री’ की यह तपिश नीतीश सरकार की साख को और झुलसाती है।

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