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संसद में ‘महा-युद्ध’; क्या Om Birla बनेंगे पद से हटाए जाने वाले देश के पहले स्पीकर या विपक्ष की चौथी कोशिश भी होगी नाकाम?

Om Birla

आजाद भारत के संसदीय इतिहास में आज एक अत्यंत दुर्लभ और ऐतिहासिक मोड़ देखने को मिल रहा है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष ने उन्हें पद से हटाने का संकल्प (Resolution) पेश कर दिया है। यह भारतीय लोकतंत्र की चौथी ऐसी घटना है जब सदन के संरक्षक को ही कटघरे में खड़ा किया गया है। बजट सत्र के दूसरे चरण के दूसरे दिन 118 विपक्षी सांसदों के समर्थन से यह प्रस्ताव सदन पटल पर रखा गया। विपक्ष का सीधा आरोप है कि स्पीकर Om Birla का रवैया पक्षपाती रहा है और राहुल गांधी सहित विपक्ष के अन्य नेताओं को अपनी बात रखने का पर्याप्त समय नहीं दिया जा रहा। इस ‘महा-जंग’ ने न केवल सदन के भीतर का तापमान बढ़ा दिया है, बल्कि कई संवैधानिक सवालों को भी जन्म दे दिया है।

इतिहास के पन्ने: जब तीन बार स्पीकर को हटाने की हुई नाकाम कोशिश

भारतीय संसद के इतिहास में इससे पहले तीन बार स्पीकर्स के खिलाफ ऐसे मोर्चे खुले हैं, लेकिन एक बार भी कोई हटाया नहीं जा सका। पहली बार 1954 में देश के पहले स्पीकर जी.वी. मावलंकर के खिलाफ 21 सांसदों ने प्रस्ताव लाया था, जिसे सदन ने खारिज कर दिया। दूसरी कोशिश सरदार हुकम सिंह के खिलाफ हुई, लेकिन वे 50 सांसदों का समर्थन न जुटा पाने के कारण चर्चा तक भी नहीं पहुँच सके। तीसरी बार 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ तीखी बहस हुई, लेकिन बहुमत की वजह से प्रस्ताव गिर गया। अब 2026 में ओम बिरला चौथे ऐसे स्पीकर बन गए हैं जिनकी अग्निपरीक्षा हो रही है। इस बार विपक्ष के पास 118 सांसदों का समर्थन है, जो पिछले रिकॉर्ड्स के मुकाबले कहीं अधिक है।

आर्टिकल 96 और कुर्सी का संवैधानिक संग्राम

चर्चा की शुरुआत होते ही एक बड़ा तकनीकी विवाद खड़ा हो गया। नियम के मुताबिक, जब स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव आता है, तो वे कुर्सी पर नहीं बैठ सकते। उनकी जगह पीठासीन अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने कमान संभाली। यहीं पर कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने ‘आर्टिकल 96’ का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब स्पीकर खुद आरोपी हैं, तो उन्होंने ही अपनी अनुपस्थिति में बैठने वाले पैनल का नाम कैसे तय किया? उन्होंने इसे “आरोपी द्वारा अपना जज खुद चुनने” जैसा करार दिया। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने पलटवार करते हुए कहा कि स्पीकर का ऑफिस कभी खाली नहीं रहता और यह पूरी प्रक्रिया नियम के तहत ही चल रही है। इसी बीच ‘डिप्टी स्पीकर’ का पद सालों से खाली होने का मुद्दा भी गूँजा, जिसे विपक्ष ने ‘संवैधानिक खालीपन’ बताया।

सदन के भीतर ‘चौतरफा’ मोर्चेबंदी और वोटिंग का गणित

संसद में इस वक्त केवल स्पीकर का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि तृणमूल कांग्रेस अब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भी ‘रिमूवल मोशन’ लाने की तैयारी कर रही है, जो अपने आप में एक पहली घटना होगी। जहाँ तक ओम बिरला को हटाने की बात है, तो इसके लिए सदन के ‘प्रभावी बहुमत’ (Effective Majority) की आवश्यकता होती है, यानी सदन में मौजूद भरी हुई सीटों का आधे से अधिक हिस्सा। सरकार की तरफ से अनुराग ठाकुर और निशिकांत दुबे जैसे दिग्गज मोर्चा संभाल रहे हैं, वहीं विपक्ष लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दे रहा है।

क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?

रात तक चलने वाली 10 घंटे की इस लंबी बहस के बाद तस्वीर साफ होगी। गणित के हिसाब से सरकार का पलड़ा भारी दिख रहा है, लेकिन विपक्ष का मानना है कि उनका मकसद जीत से ज्यादा सरकार की ‘मनमानी’ को जनता के सामने बेनकाब करना है। सवाल अभी भी वही है—क्या ओम बिरला भारत के पहले ऐसे स्पीकर बनेंगे जिन्हें पद छोड़ना पड़ेगा, या फिर यह कोशिश भी इतिहास की फाइलों में एक रिकॉर्ड बनकर दर्ज हो जाएगी? इस फैसले की इबारत भारतीय लोकतंत्र के मंदिर में लंबे समय तक याद रखी जाएगी।

Om Birla

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