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‘माता पिता को खोने वाले सनातनी कर्मचारियों को मिले 13 दिन का सवैतनिक शोक अवकाश’- डा दिनेश शर्मा

Parliament Budget Session 2026

Parliament Budget Session 2026: राज्यसभा सांसद एवं यूपी के पूर्व उपमुख्यमंत्री यूपी डा दिनेश शर्मा ने माता पिता को खोने वाले सरकारी एवं निजी क्षेत्र के सनातनी कर्मचारियों के लिए 13 दिन के अनिवार्य सवैतनिक शोक अवकाश की मांग की है। उनका कहना है कि सनातन परम्परा की रक्षा के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक है।

Parliament Budget Session 2026: 13 दिन का अनिवार्य शोक अवकाश

इस अवकाश को आकस्मिक अवकाश और अर्जित अवकाश से अलग रखा जाए, जिससे कि कोई भी भारतीय अपनी आजीविका और धर्म पालन के बीच में किसी एक का चुनाव करने को विवश नहीं हो। इस अवकाश का प्राविधान नहीं होने के कारण ही सनातनी परम्परा के कर्मचारी 13 दिन की अंतिम क्रिया को दो अथवा तीन दिन में ही करने को मजबूर हो रहे हैं।

कनाडा में इसकी अवधि 10 दिन तो ब्रिटेन में दो सप्ताह की

राज्य सभा में शून्यकाल के दौरान इस विषय पर सांसद ने कहा कि भारत के लाखों सनातनी कर्मचारियों के जीवन में तब एक विकट संकट सामने आता है जब वे अपने माता पिता को खोने के बाद अपने धार्मिक कर्तव्य को पूरा करने अथवा नौकरी को बचाने में से किसी एक को चुनने के लिए बाध्य होते हैं। देश के श्रम कानून में सवैतनिक शोक अवकाश का प्राविधान नहीं होने के कारण यह स्थिति सामने आ रही है। (Parliament Budget Session 2026)

दुनिया के तमाम विकसित देशों जैसे कनाडा ब्रिटेन फ्रांस आदि में अपने पारिवारिक सदस्यों को खोने की स्थिति में सवैतनिक शोक अवकाश के प्राविधान हैं। कनाडा में इसकी अवधि 10 दिन तो ब्रिटेन में दो सप्ताह की है।

धार्मिक कर्तव्यों और नौकरी के बीच संघर्ष

डा शर्मा ने कहा कि शास्त्रों में माता पिता की सेवा और उनकी मृत्यु के बाद कर्तव्यों को पितृ ऋण से मुक्ति का एक मात्र मार्ग बताया गया है। भारत का समाज एक धर्मनिष्ठ समाज है। गरुड पुराण के अनुसार पहले 10 दिन प्रेतत्व की अवस्था होती है और तेरहवी और शुद्धि हवन के बाद ही परिवार समाज में लौटने के योग्य होता है। अथर्ववेद के अनुसार पुत्र द्वारा माता पिता का अंतिम संस्कार करना अनिवार्य कर्तव्य है। (Parliament Budget Session 2026)

हावर्ड की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि शोक में डूबे कर्मचारी की उत्पादकता आधी ही रह जाती है। आज के प्रतिस्पर्धी एवं डिजिटल युग में बच्चे अपने माता पिता के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को दो अथवा तीन दिन में ही पूरा करने के लिए बाध्य हो रहे हैं। यह स्थिति धार्मिक दृष्टि से विनाशकारी एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक है। कर्मचारी मन में ग्लानि और अपराधबोध लिए कार्यक्षेत्र में लौटने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

उच्च न्यायालय का निर्णय: अंतिम संस्कार को मौलिक अधिकार मानना

उनका कहना था कि मानव जीवन केवल सांसारिक संसाधनों के उपभोग के लिए नहीं है बल्कि ये कर्तव्य व धर्म के पालन के लिए भी है। घर के वरिष्ठ सदस्य की जिम्मेदारी होती है कि वह सामाजिक मूल्यो, संस्कृति एवं परम्पराओं को अगली पीढी को हस्तान्तरित करे। अभी हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने माता पिता के अंतिम संस्कार को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार कहा है। (Parliament Budget Session 2026)

जब एक कैदी को रस्मों के पालन के लिए पैरोल मिलती है तो फिर कर्मचारियों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने भारत सरकार से सभी क्षेत्रों में सरकारी और नीचे दोनों क्षेत्र में अंतिम संस्कार करने वाले कर्मचारियों को 13 दोनों का अनिवार्य सवैतनिक शोक अवकाश जिसे आकस्मिक और अर्जित अवकाश से अलग रखते हुए घोषित करने की मांग की।

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