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Land-for-jobs Scam: लालू यादव को लगा बहुत बड़ा झटका! लैंड फॉर जॉब केस में याचिका खारिज

Land-for-jobs Scam

Land-for-jobs Scam: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कथित भूमि-बदले-नौकरी मामले में CBI की FIR को रद्द करने की मांग वाली RJD प्रमुख और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने याचिका को योग्यताहीन बताते हुए खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा की पीठ ने यह आदेश पारित किया।

Land-for-jobs Scam: अदालत में दलीलों की जंग

याचिका में 2022 में दर्ज FIR के साथ-साथ 2022, 2023 और 2024 में दायर तीन आरोपपत्रों और संज्ञान लेने वाले आदेशों को चुनौती दी गई थी। यादव ने तर्क दिया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व स्वीकृति के अभाव के कारण पूरी कार्यवाही कानूनी रूप से अमान्य थी।

यादव की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने कहा कि कथित कृत्य उनके रेल मंत्री रहते हुए किए गए थे और इसलिए ये उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे में आते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की जांच या छानबीन शुरू करने से पहले पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है। (Land-for-jobs Scam)

इस याचिका का विरोध करते हुए, CBI की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि ऐसी किसी मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि नियुक्तियों से संबंधित निर्णय महाप्रबंधकों द्वारा लिए जाते हैं, न कि सीधे मंत्री द्वारा, इसलिए धारा 17ए के तहत संरक्षण लागू नहीं होगा। इससे पहले अदालत ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनी थीं और फैसला सुनाने से पहले लिखित दलीलें दाखिल करने के लिए समय भी दिया था।

14 साल बाद FIR: देरी पर क्या उठे सवाल?

यह मामला मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य जोन में ग्रुप डी पदों पर कथित अनियमित नियुक्तियों से संबंधित है, जो यादव के रेल मंत्री के कार्यकाल (2004 से 2009) के दौरान हुई थीं। CBI ने आरोप लगाया है कि यादव के परिवार के सदस्यों या सहयोगियों के नाम पर भूमि हस्तांतरित करने के बदले में नौकरियां दी गईं थीं। (Land-for-jobs Scam)

यह एफआईआर 18 मई, 2022 को यादव और अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज की गई थी, जिनमें उनकी पत्नी, दो बेटियां, अज्ञात सरकारी अधिकारी और निजी व्यक्ति शामिल हैं। अपनी याचिका में यादव ने देरी का मुद्दा भी उठाया और कहा कि कथित घटनाओं के लगभग 14 साल बाद एफआईआर दर्ज की गई, जबकि पहले की जांच एक सक्षम अदालत में रिपोर्ट प्रस्तुत करके बंद कर दी गई थी। उन्होंने दावा किया कि पहले की बंद रिपोर्टों का खुलासा किए बिना मामले को दोबारा खोलना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

याचिका में आगे आरोप लगाया गया कि जांच राजनीतिक रूप से प्रेरित थी और निष्पक्ष जांच के उनके अधिकार का उल्लंघन करती थी। इसमें तर्क दिया गया कि धारा 17ए के तहत अनिवार्य मंजूरी के बिना जांच शुरू करना संपूर्ण कार्यवाही को प्रारंभ से ही अमान्य कर देता है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है और मामले की जांच और कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी। (Land-for-jobs Scam)

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