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भोजशाला विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने HC के फैसले पर रोक से किया इनकार, मुस्लिम पक्ष को दी नमाज अदा करने की अनुमति

Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row

Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के 15 मई 2026 के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने और यथास्थिति (Status quo ante) बहाल करने से साफ इनकार कर दिया है। हालांकि, अदालत ने मुस्लिम समुदाय को बड़ी राहत देते हुए एक वैकल्पिक व्यवस्था के तहत परिसर के पास शुक्रवार की नमाज अदा करने की मंजूरी दे दी है।

Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row: मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक स्थान पर जुमे की नमाज की अनुमति

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की पीठ ने मध्य प्रदेश सरकार, हिंदू पक्षकारों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को नोटिस जारी कर अपीलों पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी है। मामले की सुनवाई दो से तीन हफ्ते बाद करने का निर्देश दिया गया है।

उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने या स्थल पर पूजा-अर्चना को नियंत्रित करने वाले 2003 के एएसआई समझौते को पुनर्जीवित करने से इनकार करते हुए, न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित किया जिसमें मुस्लिम समुदाय के सदस्यों को विवादित परिसर से सटे एक अलग खुले स्थान पर शुक्रवार की नमाज अदा करने की अनुमति दी गई। (Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row)

कोर्ट ने कहा, “इस बीच, अंतरिम उपाय के रूप में और दोनों पक्षों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना… अपीलकर्ता और मुस्लिम समुदाय के अन्य सदस्यों को शुक्रवार को दोपहर 1 से 3 बजे के बीच नमाज अदा करने के लिए संबंधित परिसर से सटे एक अलग खुले स्थान की व्यवस्था की जा सकती है। यह व्यवस्था अस्थायी होगी और अपील के अंतिम निर्णय के अधीन होगी।” इसके अलावा, कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को कड़े निर्देश दिए हैं कि कोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना भोजशाला इमारत की मौजूदा संरचनात्मक स्थिति में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंहवी की टिप्पणी

मुतवल्ली परिवार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंहवी और अन्य मुस्लिम अपीलकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ेफ़ा अहमदी और वृंदा ग्रोवर ने न्यायालय से उस व्यवस्था को बहाल करने की अपील की, जो 2003 से उस स्थल पर लागू थी, जिसके तहत मुसलमान दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच शुक्रवार की नमाज अदा करते थे, जबकि हिंदू मंगलवार को और वसंत पंचमी के दौरान पूजा करते थे।

सिंघवी ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखने के दो दिन बाद, 15 मई को सुनाया, जिससे मुस्लिम पक्ष को राज्य और एएसआई द्वारा इसे लागू करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय में जाने का कोई वास्तविक अवसर नहीं मिला। उन्होंने कहा, “अगर मैं सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच जाता, तो भी मेरे पास समय नहीं होता।” उन्होंने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय को अपने फैसले पर अमल करने से पहले कुछ समय देना चाहिए था, और कहा कि यह व्यवस्था लगभग 23 वर्षों से निर्बाध रूप से जारी है। (Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row)

इस विवाद को भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने से जुड़ा मुद्दा बताते हुए, सिंघवी ने कहा कि प्रस्तावना में सबसे महत्वपूर्ण शब्द बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता हैं, वे एक दूसरे को पोषित करते हैं। हालांकि, न्यायालय ने पूर्व व्यवस्था को बहाल करने वाला अंतरिम आदेश पारित करने पर आपत्ति जताई।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत बोले—धार्मिक विवादों में अदालतों को रहना होगा सतर्क

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि अदालतों को संवेदनशील धार्मिक विवादों में अंतरिम आदेशों के परिणामों के प्रति सचेत रहना चाहिए। न्यायालय ने यह भी गौर किया कि पूर्व एएसआई व्यवस्था के तहत भी उस स्थान पर कानून-व्यवस्था की समस्याएँ थीं। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “यह ऐसा मामला है जिसमें दोनों पक्षों को धैर्य रखना चाहिए। जरूरत पड़ने पर हम इस मामले की सुनवाई प्रतिदिन करने के लिए तैयार हैं।” (Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row)

न्यायिक आदेशों के क्रियान्वयन का जिक्र करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि एक दिन की देरी के भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं। एक बार जब कोई अदालत न्यायिक आदेश जारी कर देती है, तो उसके क्रियान्वयन में देरी के भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं। न्यायमूर्ति बागची ने यह भी सवाल उठाया कि क्या अपीलकर्ताओं की शिकायत मूल रूप से उच्च न्यायालय के फैसले के कार्यान्वयन के खिलाफ थी, न कि स्वयं फैसले के खिलाफ।

2003 की व्यवस्था बहाल करने से कोर्ट का इनकार

मध्य प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पूर्व व्यवस्था को बहाल करने की याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले को लगभग दो महीने बीत चुके हैं और प्रशासन ने जमीनी स्तर पर शांति सुनिश्चित कर ली है। मेहता ने बताया, “प्रशासन के हस्तक्षेप के कारण वे दो महीने बाद आए हैं, इसलिए स्थिति शांत और शांतिपूर्ण है।” मेहता ने सवाल उठाया कि याचिकाकर्ता थोड़े समय के अंतराल के बाद मामले की अंतिम सुनवाई होने तक इंतजार क्यों नहीं कर सकते थे। (Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row)

वरिष्ठ अधिवक्ता हुज़ेफ़ा अहमदी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय सदियों से इस स्थल पर प्रार्थना करता रहा है और कलेक्टर द्वारा 1997 में विकसित की गई व्यवस्था, जिसे बाद में 2003 में एएसआई द्वारा औपचारिक रूप दिया गया, सह-अस्तित्व की भावना को दर्शाती है। उन्होंने तर्क दिया कि मुसलमानों ने स्मारक में प्रवेश साझा करने पर सहमति जताई थी, जबकि हिंदुओं को वसंत पंचमी के दौरान और मंगलवार को पूजा करने की अनुमति थी।

अहमदी के अनुसार, उच्च न्यायालय के फैसले और उसके बाद एएसआई के आदेश ने हिंदुओं को अप्रतिबंधित पहुंच प्रदान करके एक लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया। (Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row)

वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने यह भी तर्क दिया कि मस्जिद 12वीं शताब्दी की है और उन्होंने सवाल उठाया कि अब इस स्थापित प्रथा को क्यों बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले ने सदियों से चली आ रही यथास्थिति को बदल दिया है और मुस्लिम समुदाय को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है।

मुस्लिम पक्ष द्वारा दायर अपीलों में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के 15 मई के फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें यह घोषित किया गया था कि विवादित स्मारक का धार्मिक स्वरूप भोजशाला का है, जो देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है। उच्च न्यायालय ने 2003 के एएसआई (अमेरिकी राष्ट्रीय सेवा संस्थान) के उस समझौते को रद्द कर दिया था, जिसमें भोजशाला परिसर में हिंदुओं के पूजा-पाठ के अधिकार को प्रतिबंधित किया गया था, जबकि मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज अदा करने की अनुमति थी। (Dhar Bhojshala-Kamal Maula Row)

न्यायालय ने केंद्र सरकार और एएसआई को मंदिर के प्रशासन और प्रबंधन के संबंध में निर्णय लेने का निर्देश दिया, साथ ही संरक्षित स्मारक के संरक्षण और नियमन पर एएसआई का समग्र नियंत्रण बरकरार रखने को भी कहा। उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि केंद्र सरकार लंदन के एक संग्रहालय में रखी देवी सरस्वती की प्रतिमा को वापस लाने और भोजशाला परिसर में उसकी पुनः स्थापना की मांग वाली याचिकाओं पर विचार कर सकती है। साथ ही, न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि मुस्लिम समुदाय धार जिले में मस्जिद या प्रार्थना स्थल के निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि के आवंटन की मांग करता है, तो राज्य सरकार कानून के अनुसार ऐसे अनुरोध पर विचार कर सकती है।


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