Nari Shakti Vandan Adhiniyam Bill Failed 2026: संसद में पेश किया गया ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ लोकसभा में गिर गया है। दरअसल, सरकार ने इसे आधी आबादी के उज्जवल भविष्य से जोड़ा था। लेकिन, वोटिंग के दौरान बहुमत का आंकड़ा न मिल पाने की वजह से यह बिल पास नहीं हो सका। अब इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है।
संसद का गणित: क्यों अटका 33% आरक्षण?
सरकार का उद्देश्य संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना था। हालांकि, जब फैसला लेने का समय आया, तो आंकड़े पक्ष में नहीं रहे।
- वोटिंग का नतीजा: बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े। लेकिन, दो-तिहाई बहुमत की सीमा पार न हो सकी।
- विपक्ष का तर्क: विपक्षी दलों ने इसे ‘सीटों के नए बंटवारे’ (Delimitation) से जुड़ी राजनीतिक चाल बताया।
- विरोध की वजह: विपक्ष को डर है कि इससे दक्षिण भारत और छोटे राज्यों की सीटों को नुकसान होगा।
योगी सरकार का पलटवार: लखनऊ में ‘जन आक्रोश पदयात्रा’
बिल गिरने का असर अब उत्तर प्रदेश की सड़कों पर भी दिखने लगा है। दरअसल, राजधानी लखनऊ में भाजपा ने एक बड़ी ‘जन आक्रोश महिला पदयात्रा’ निकाली।
- महारैली का नेतृत्व: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद इस यात्रा में शामिल हुए।
- विपक्ष पर निशाना: डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और केशव मौर्य ने इसे विपक्ष की ‘महिला विरोधी’ सोच बताया।
- शक्ति प्रदर्शन: रैली के चलते हजरतगंज और आसपास के इलाकों में भारी ट्रैफिक जाम रहा और कई स्कूलों में छुट्टी भी करनी पड़ी।
यही वजह है कि सरकार अब इस मुद्दे को सीधे जनता के बीच ले जा रही है। दरअसल, भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह महिलाओं के हक में खड़ी है और विपक्ष इसमें बाधा डाल रहा है।
राहुल-प्रियंका का जवाब: ‘लोकतंत्र की जीत’
दूसरी तरफ, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे अपनी जीत मान रहे हैं। दरअसल, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने इसे सरकार की गलत कोशिशों पर रोक बताया है।
- विपक्ष का आरोप: सरकार महिला सशक्तिकरण के नाम पर राजनीति कर रही है।
- संविधान की रक्षा: विपक्ष का कहना है कि उन्होंने संविधान और राज्यों के हितों की रक्षा की है।
महिलाओं का हक या चुनावी एजेंडा?
भले ही बिल इस बार पास नहीं हो पाया, लेकिन महिला आरक्षण का मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। यही वजह है कि आने वाले समय में यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। हालांकि, सरकार ने संकेत दिए हैं कि वे इसे दोबारा लाने की कोशिश करेंगे।
अंततः, अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सच में महिलाओं को अधिकार दिलाने की कोशिश है? या फिर यह 2027 के चुनावों से पहले का एक बड़ा राजनीतिक बिसात है। दरअसल, असली तस्वीर आने वाले वक्त में ही साफ होगी।









