मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में हाल ही में इंदौर (Indore) और भोपाल (Bhopal) जैसे शहरों में दूषित पानी से हुई मौतों और बीमारियों के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने कड़ा रुख अपनाया है। आज, 16 जनवरी 2026 को NGT की भोपाल बेंच ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए एक उच्च-स्तरीय कमेटी का गठन किया है और पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए 14 कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

मध्य प्रदेश की नदियों और नलों में बहते पानी की शुद्धता को लेकर अब देश की सबसे बड़ी पर्यावरण अदालत ने मोर्चा संभाल लिया है। प्रदेश के कई हिस्सों में दूषित पानी और गिरते भूजल स्तर की चीख जब एनजीटी (NGT) की दहलीज तक पहुँची, तो ट्रिब्यूनल ने न केवल एक उच्च-स्तरीय कमेटी का गठन कर दिया, बल्कि 14 ऐसे ‘ब्रह्मास्त्र’ रूपी दिशा-निर्देश जारी किए हैं जो सरकार से लेकर स्थानीय निकायों तक की जवाबदेही तय करेंगे। 2026 के इस तपते दौर में, जहाँ पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष बढ़ रहा है, एनजीटी का यह हस्तक्षेप उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण बना है जो दशकों से साफ पानी के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह फैसला केवल एक आदेश नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के जल भविष्य को सुरक्षित करने का एक निर्णायक ब्लूप्रिंट है।

NGT के 14 कड़े दिशा-निर्देश: मुख्य बिंदु
NGT ने पेयजल आपूर्ति के बुनियादी ढांचे और शुद्धिकरण को लेकर निम्नलिखित निर्देश दिए हैं
NGT के 14 कड़े दिशा-निर्देश: मुख्य बिंदु
NGT ने पेयजल आपूर्ति के बुनियादी ढांचे और शुद्धिकरण को लेकर निम्नलिखित निर्देश दिए हैं
- MIS और 24×7 वाटर ऐप: एक मजबूत ‘प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (MIS) और मोबाइल ऐप बनाया जाए, जिस पर पानी की गुणवत्ता रिपोर्ट, सप्लाई का समय और शिकायत निवारण की जानकारी हो।
- GIS मैपिंग: पूरे राज्य में पेयजल और सीवेज लाइनों की ‘GIS-आधारित मैपिंग’ हो ताकि यह पता चले कि कहाँ सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल रहा है।
- एरेशन और क्लोरीनेशन: पानी की शुद्धता के लिए प्री-क्लोरीनेशन, पोस्ट-क्लोरीनेशन के साथ-साथ ‘एरेशन प्रक्रिया’ (Aeration process) अनिवार्य रूप से अपनाई जाए।
- टैंको की सफाई: सभी ओवरहेड टैंकों और सम्प-वेल (Sumps) को हमेशा चालू रखा जाए और उनकी नियमित सफाई व क्लोरीनेशन हो।
- पाइपलाइन मरम्मत: लीकेज और ट्रांसमिशन लॉस को रोकने के लिए युद्धस्तर पर पाइपलाइनों की मरम्मत हो।
- अतिक्रमण हटाना: जल स्रोतों (तालाब, कुएं, बावड़ी) के आसपास से सभी प्रकार के अतिक्रमण तुरंत हटाए जाएं।
- ग्रीष्मकालीन जल प्रबंधन: मार्च से जुलाई के बीच पानी की कमी को देखते हुए निर्माण कार्यों पर रोक लगे और वार्ड-वार राशनिंग (वैकल्पिक दिन) की व्यवस्था हो।
- जल पुनर्चक्रण (Recharge): सार्वजनिक कुओं और बावड़ियों को पुनर्जीवित (Regenerate) करने की योजना लागू की जाए।
- सख्त वाटर हार्वेस्टिंग: सरकारी और निजी भवनों (स्कूल/कॉलेज सहित) में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई (Punitive action) की जाए।
- क्या करें-क्या न करें: नागरिकों के लिए पानी के उपयोग के संबंध में ‘Do’s and Don’ts’ जारी किए जाएं।
- डेयरियों का विस्थापन: शहर सीमा के भीतर 2 से अधिक पशुओं वाली सभी डेयरियों को 4 महीने के भीतर शहर से बाहर शिफ्ट किया जाए।
- मूर्ति विसर्जन पर पूर्ण रोक: किसी भी पेयजल स्रोत (डैम, तालाब) में मूर्तियों का विसर्जन पूरी तरह प्रतिबंधित रहे।
- मीटरिंग: सभी घरेलू और व्यावसायिक पानी के कनेक्शनों पर मीटर लगाए जाएं।
- टैंकर आपूर्ति: जल संकट के समय टैंकरों से आपूर्ति के लिए पूर्व निर्धारित शर्तों के साथ योजना तैयार रहे।

IIT इंदौर और CPCB की संयुक्त जांच समिति गठित
मामले की गंभीरता को देखते हुए, ट्रिब्यूनल ने जमीनी हकीकत की जांच के लिए एक 6-सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जो 6 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देगी। समिति के सदस्य नीचे बताए गए हैं-:
- आईआईटी (IIT), इंदौर के निदेशक द्वारा नामांकित विशेषज्ञ।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), भोपाल के प्रतिनिधि।
- प्रमुख सचिव, पर्यावरण विभाग, म.प्र. शासन।
- प्रमुख सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग।
- जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि।
- म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के प्रतिनिधि (नोडल एजेंसी)।

“NGT का यह हस्तक्षेप मध्य प्रदेश के शहरी बुनियादी ढांचे के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है। 14-सूत्रीय एजेंडे का सख्ती से पालन ही भविष्य में ‘इंदौर जैसी त्रासदियों’ को रोक सकता है। अब गेंद राज्य सरकार और स्थानीय निकायों के पाले में है—उन्हें यह साबित करना होगा कि वे जनता को शुद्ध पानी देने के लिए केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर भी गंभीर हैं।”









