Pakistan Economic Crisis: दक्षिण एशिया का वह मुल्क, जो कभी बुलंद दावों की दुनिया में रहता था, आज घुटनों पर है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में वह ‘महा-भूचाल’ आ चुका है, जिसकी आहट लंबे समय से मिल रही थी।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने देश के खाली खजाने और आसमान छूती तेल की कीमतों के सामने ‘सफेद झंडा’ दिखा दिया है। अब पाकिस्तान में दफ्तर बंद हैं, मंत्रियों की जेब पर कैंची चल चुकी है और आम जनता अंधेरे भविष्य की ओर देख रही है।
Pakistan Economic Crisis: जब शिक्षा और दफ्तरों पर लगा ताला
खजाने में डॉलर नहीं और पेट्रोल पंपों पर तेल नहीं—इस दोहरी मार ने पाकिस्तान को ‘वर्क फ्रॉम होम’ (WFH) मोड पर ला खड़ा किया है। सरकार ने जो पाबंदियां लगाई हैं, वे किसी भी देश की लाचारी की पराकाष्ठा हैं।
मंत्रियों की सैलरी रोक दी गई है और उनके विदेश दौरों पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है। लग्जरी गाड़ियां अब गैराज की शोभा बढ़ा रही हैं क्योंकि उनमें डलवाने के लिए तेल के पैसे नहीं हैं। और सरकारी दफ्तर अब हफ्ते में केवल 4 दिन खुलेंगे।
बाकी समय ‘अंधेरा’ रहेगा ताकि बिजली और ईंधन बचाया जा सके। अब तो आलम यह है कि 50% सरकारी स्टाफ को घर से काम करने का फरमान सुनाया गया है, ताकि सड़कों पर गाड़ियां न चलें और कीमती पेट्रोल की एक-एक बूंद बचाई जा सके। स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए हैं। पाकिस्तान में अब शिक्षा पर ‘इकोनॉमिक लॉकडाउन’ लग चुका है। (Pakistan Economic Crisis)
क्या कटौती की योजनाएं डूबती नैया को पार लगा पाएंगी?
सड़कों पर सन्नाटा है, लेकिन लोगों के दिलों में आक्रोश का शोर। ईरान-इजरायल युद्ध की वजह से बढ़ी तेल की कीमतों ने पाकिस्तान की रही-सही कमर भी तोड़ दी है। एक तरफ दुनिया अंतरिक्ष और तकनीक की बात कर रही है, और दूसरी तरफ पाकिस्तान इस बात पर लड़ रहा है कि दफ्तर में पंखा चलेगा या नहीं।
यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि एक राष्ट्र की ‘साख’ का दिवालियापन है। शाहबाज शरीफ की कटौती की योजनाएं असल में उस डूबते जहाज को बचाने की नाकाम कोशिशें हैं, जिसमें पहले ही सैकड़ों छेद हो चुके हैं। (Pakistan Economic Crisis)









