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Revolt In Iran:! 1979 की क्रांति के बाद सबसे बड़ा रक्तपात, क्या गिरने वाला है खामेनेई का तख्ता?

तेहरान की सर्द हवाओं में आज बारूद और बगावत की गंध है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान आज अपने सबसे बड़े वजूद के संकट से जूझ रहा है। वह जनवरी 2026 में बेकाबू महंगाई और रियाल के ऐतिहासिक पतन के बाद एक ‘महा-विद्रोह’ में तब्दील हो चुका है। सड़कों पर केवल नारे नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की दहाड़ है। सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की तस्वीरों को पैरों तले रौंदा जा रहा है और सुरक्षा बलों की बंदूकों के सामने निहत्थी जनता सीना तानकर खड़ी है। क्या यह ईरान के दमनकारी शासन का अंतिम अध्याय है, या खामेनेई एक बार फिर खून की नदियाँ बहाकर अपनी कुर्सी बचा लेंगे? दुनिया की नजरें तेहरान के उस तख्त पर टिकी हैं, जो आज बारूद के ढेर पर बैठा है।

ईरान की सड़कें इस वक्त आग की लपटों और खून से लाल हैं! एक तरफ आसमान छूती महंगाई का गुस्सा है, तो दूसरी तरफ 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से अब तक का सबसे बड़ा जनाक्रोश। सरकार की बंदूकों और सन्नाटा चीरती गोलियों के बावजूद, प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। क्या यह ईरान में एक नए युग की शुरुआत है या फिर किसी भयानक कत्लेआम की आहट?

आपको बताते चलें कि पिछले दो हफ्तों से ईरान के 100 से अधिक शहर युद्ध का मैदान बन चुके हैं। मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, अब तक 116 बेगुनाह लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें कई मासूम और महिलाएं शामिल हैं। तेहरान के ग्रैंड बाज़ार से उठी महंगाई की चिंगारी ने अब पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया है। सरकार ने दुनिया से संपर्क काटने के लिए इंटरनेट पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है, लेकिन ‘आज़ादी’ के नारों को दबाना नामुमकिन साबित हो रहा है। इस विद्रोह की जड़ में है ईरान की मरती हुई अर्थव्यवस्था। ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ के रिकॉर्ड गिरावट (1 डॉलर = 14 लाख रियाल) और 70% से अधिक की खाद्य महंगाई ने लोगों के चूल्हे बुझा दिए हैं। जब रोटियों के लाले पड़े, तो जनता ने धर्मतंत्र की बंदिशों को तोड़कर सड़कों पर उतरना ही आखिरी रास्ता चुना।

फिलहाल आज के मंजर को देखकर दुनिया को 1979 की वह इस्लामिक क्रांति याद आ रही है, जिसने शाह के शासन को उखाड़ फेंका था। 1979 में भी बाज़ारी (व्यापारी) और छात्र साथ आए थे, और आज भी तेहरान के बाज़ार से लेकर यूनिवर्सिटी तक ‘तानाशाह का अंत हो’ के नारे गूँज रहे हैं। देखा जाए तो यह विरोध प्रदर्शन 2009 और 2022 के आंदोलनों से कहीं अधिक खतरनाक है, क्योंकि इस बार मुद्दा सिर्फ ‘हिजाब’ या ‘वोट’ नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व और रोटी’ है। और अब ईरान के इस आंतरिक सुलगते ज्वालामुखी ने पूरी दुनिया को अलर्ट पर डाल दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीधे तौर पर चेतावनी दी है कि अगर प्रदर्शनकारियों पर अत्याचार नहीं रुका, तो अमेरिका कड़े कदम उठाने के लिए ‘लॉक एंड लोडेड’ है। इधर इजरायल के साथ हालिया तनाव ने आग में घी डालने का काम किया है।

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