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UP BJP में ‘बगावत’: पंकज चौधरी के आदेश को दिग्गजों ने दिखाया ठेंगा, क्या संगठन पर ढीली पड़ रही है ‘कैप्टन’ की पकड़?

लखनऊ ब्यूरो: उत्तर प्रदेश की सियासत की आबोहवा में इन दिनों एक अजीब सी खलबली महसूस की जा रही है। यह खलबली विपक्ष के खेमे में नहीं, बल्कि सूबे की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के भीतर मची है। सवाल यूपी बीजेपी के ‘कैप्टन’ पंकज चौधरी की साख पर खड़ा हो गया है। क्या पंकज चौधरी वाकई संगठन पर वो पकड़ रखते हैं जो एक प्रदेश अध्यक्ष की होनी चाहिए? पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने यूपी बीजेपी के भीतर चल रही ‘जातीय खींचतान’ और अनुशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है।


फरमान बनाम विद्रोह: जब अनुशासन का डंडा हुआ बेअसर

अभी कुछ ही दिन पहले लखनऊ के प्रदेश मुख्यालय से एक सख्त फरमान जारी हुआ था। पंकज चौधरी ने स्पष्ट आदेश दिया था कि “कोई भी नेता जातिगत बैठकें या सम्मेलन नहीं करेगा और न ही उनमें शामिल होगा।” मकसद साफ था—पार्टी की छवि को ‘सिर्फ जातियों की पार्टी’ बनने से बचाना। लेकिन इस आदेश की स्याही सूखती, उससे पहले ही बीजेपी के ओबीसी (OBC) और लोधी समाज के दिग्गजों ने इस फरमान को कचरे के डिब्बे में डाल दिया। अल्टीमेटम के बावजूद इन नेताओं ने बड़ा सम्मेलन किया और पंकज चौधरी के अनुशासन के डंडे को पूरी तरह ठेंगा दिखा दिया।

साख पर सवाल: अलग-अलग जातियों के लिए अलग नियम?

इस मामले ने पंकज चौधरी की ‘पॉलिटिकल इमेज’ पर एक बड़ा क्वेश्चन मार्क लगा दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या पंकज चौधरी के नियम अलग-अलग जातियों के लिए अलग-अलग हैं?

  • कार्रवाई में दोहरा मापदंड: जब कुछ ब्राह्मण विधायकों ने अपनी बैठक करने की कोशिश की थी, तो उन पर तुरंत कार्रवाई की गाज गिरी थी।
  • दिग्गजों का दुस्साहस: लोधी समाज की बैठक में केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह, विपिन डेविड और टी. राजा सिंह जैसे बड़े नाम एक ही मंच पर खड़े होकर शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे। इन पर चुप्पी क्यों साधी गई? क्या वाकई संगठन में अब पंकज चौधरी की बात कोई नहीं सुन रहा?

‘कागजी शेर’ या मजबूरी के अध्यक्ष?

बीजेपी के भीतर अब कई ‘पावर सेंटर्स’ (Power Centers) बन गए हैं। लोधी और ओबीसी नेताओं ने जो बैठकें कीं, वो कोई गुप्त नहीं थीं; बाकायदा होर्डिंग लगे और सोशल मीडिया पर प्रचार हुआ। ऐसा लगता है कि बड़े नेताओं को पंकज चौधरी की ‘अथॉरिटी’ की कोई परवाह नहीं है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा आम है कि पंकज चौधरी आज संगठन के उस चौराहे पर खड़े हैं जहाँ वो आदेश तो देते हैं, पर उसे लागू करवाने की ताकत नहीं जुटा पा रहे। सवाल यह भी है कि क्या इन बागी नेताओं को ऊपर से किसी बड़े धड़े का ‘गुप्त संरक्षण’ प्राप्त है? बीएल वर्मा और धर्मपाल सिंह जैसे मझे हुए खिलाड़ी बिना किसी ‘इशारे’ के प्रदेश अध्यक्ष के आदेश की अवहेलना नहीं करेंगे।

2027 का डर और बिखरता कुनबा

इस पूरे विवाद के पीछे 2027 का विधानसभा चुनाव सबसे बड़ा कारण है। ओबीसी और लोधी नेताओं को पंकज चौधरी के ‘अनुशासन’ से ज्यादा अपने ‘वोट बैंक’ की चिंता है। उन्हें डर है कि अगर वे अपनी जाति को गोलबंद नहीं करेंगे, तो विपक्ष का ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नैरेटिव उनके वोट बैंक में सेंध लगा देगा। लेकिन इस चक्कर में पंकज चौधरी की जो छवि खराब हो रही है, उसका फायदा विपक्ष सरेआम उठा रहा है। सपा और कांग्रेस अब चुटकी ले रहे हैं कि “जिस पार्टी में अध्यक्ष की बात कोई नहीं मानता, वो प्रदेश क्या संभालेंगे?”

निष्कर्ष: साख बचेगी या मिट्टी में मिलेगी?

पंकज चौधरी के सामने अब एक ऐसी दुविधा है जहाँ कुआँ भी है और खाई भी। अगर वे इन बड़े नेताओं पर कड़ा एक्शन लेते हैं, तो ओबीसी और लोधी समाज की नाराजगी का खतरा है, जो 2027 में भारी पड़ सकता है। और अगर वे एक्शन नहीं लेते, तो उनकी बची-खुची साख भी मिट्टी में मिल जाएगी। यूपी बीजेपी के इतिहास का यह वह दौर है जहाँ ‘अध्यक्ष’ तो कुर्सी पर बैठा है, लेकिन रिमोट कंट्रोल शायद कहीं और है। क्या यह आंतरिक कलह बीजेपी को 2027 के महासंग्राम में भारी पड़ेगी?

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