UP Politics: समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को अब डॉ. राम मनोहर लोहिया ट्रस्ट का भी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया है। उन्होंने अपने चाचा और वरिष्ठ सपा नेता शिवपाल सिंह यादव की जगह ली है, जो पिछले 9 वर्षों से इस पद पर काबिज थे। यह फैसला सोमवार को लखनऊ में हुई लोहिया ट्रस्ट की एक उच्च-स्तरीय बैठक में लिया गया। सूत्रों के अनुसार, यह बदलाव पूरी तरह से सर्वसम्मति से हुआ है। बैठक में ट्रस्ट के सभी 8 सदस्य मौजूद थे, जिनमें स्वयं शिवपाल सिंह यादव भी शामिल थे।
UP Politics: चाचा ने खुद भतीजे को सौंपी विरासत
खबरों के मुताबिक, बैठक में प्रस्ताव रखा गया कि अब पार्टी और ट्रस्ट के नेतृत्व में एकरूपता होनी चाहिए। इस प्रस्ताव पर शिवपाल यादव ने भी अपनी सहमति जताई, जिसके बाद आधिकारिक तौर पर अखिलेश यादव को अध्यक्ष चुन लिया गया। इस नियुक्ति के साथ ही अखिलेश यादव अब समाजवादी आंदोलन से जुड़ी तीनों प्रमुख संस्थाओं के मुखिया बन गए हैं। उनके पास पहले से ही समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद है, जनेश्वर मिश्र ट्रस्ट की अध्यक्षता है और अब लोहिया ट्रस्ट की कमान भी उनके पास आ गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अखिलेश यादव की अनडिस्प्यूटेड लीडर वाली छवि को और पुख्ता करता है। अब पार्टी का संगठन और उसकी वैचारिक संस्थाएं दोनों का रिमोट कंट्रोल एक ही हाथ में होगा, जिससे निर्णय लेने में तेजी आएगी और विरोधाभास की स्थिति खत्म होगी। (UP Politics)
2017 का फ्लैशबैक: जब ‘गृहयुद्ध’ का केंद्र बना था लोहिया ट्रस्ट
इस बदलाव को समझने के लिए हमें 2017 के उस दौर में जाना होगा, जब यादव परिवार में वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी। उस समय सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने अपने भाई रामगोपाल यादव को हटाकर शिवपाल यादव को लोहिया ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाया था। तब यह ट्रस्ट अखिलेश यादव के खिलाफ शिवपाल यादव का एक मजबूत गढ़ माना जाता था। 2017 से लेकर अब तक, शिवपाल यादव ही इस ट्रस्ट का संचालन कर रहे थे। लेकिन 2022 में चाचा-भतीजे के बीच सुलह और अब 2026 में इस पद के हस्तांतरण ने उस पुराने पारिवारिक कलह के अध्याय को पूरी तरह से बंद कर दिया है।
ट्रस्ट का महत्व और राजनीतिक मायने
लोहिया ट्रस्ट महज एक संस्था नहीं है। इसका गठन समाजवादी पार्टी की स्थापना से भी पहले हुआ था और यह समाजवादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ पार्टी के लिए फंड जुटाने और संसाधनों के प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाता है। जानकारों का कहना है कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव करीब हैं। ऐसे में अखिलेश यादव चाहते हैं कि पार्टी की वित्तीय और वैचारिक मशीनरी पूरी तरह से उनके निर्देशन में काम करे। शिवपाल यादव का पद छोड़ना यह संकेत देता है कि वे अब सक्रिय चुनावी राजनीति और संगठन के मैदानी काम पर ज्यादा फोकस करेंगे, जबकि नीतिगत नियंत्रण अखिलेश के पास रहेगा। (UP Politics)
विपक्ष का हमला- बीजेपी ने कसा तंज
इस बदलाव पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने तंज कसते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी में परिवारवाद का यह नया उदाहरण है। उन्होंने कहा, “डॉ. लोहिया कभी परिवारवादी नहीं थे, लेकिन उनके नाम पर बने ट्रस्ट को पूरी तरह से एक परिवार की जागीर बना दिया गया है।” बीजेपी ने इसे चाचा शिवपाल के कद को छोटा करने की कोशिश के तौर पर पेश किया है।









