US-Iran Peace Deal: 107 दिन… यानी पूरे साढ़े तीन महीने। इतने लंबे समय तक चली अमेरिका और ईरान की जंग ने सिर्फ पश्चिम एशिया को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित किया। तेल के दाम आसमान पर पहुंच गए, समुद्री व्यापार ठप होने लगा, सप्लाई चेन बुरी तरह हिल गई और दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया। लेकिन अब आखिरकार वो खबर आ गई है, जिसका इंतजार पूरी दुनिया कर रही थी।
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते पर सहमति बन चुकी है और अगर सब कुछ तय योजना के मुताबिक रहा तो आने वाले दिनों में इस डील पर आधिकारिक मुहर भी लग जाएगी। लेकिन इस पूरी खबर में सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा शायद अमेरिका या ईरान को नहीं, बल्कि भारत को मिलने वाला है। और ऐसा फायदा, जो युद्ध शुरू होने से पहले भी भारत को पूरी तरह नहीं मिल रहा था।
US-Iran Peace Deal: अब सवाल ये है कि इसका भारत को क्या फायदा होगा?
दरअसल जंग शुरू होने के बाद सबसे बड़ा संकट पैदा हुआ था तेल और गैस की सप्लाई को लेकर। दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। यही वो समुद्री रास्ता है जो खाड़ी देशों को दुनिया के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। लेकिन जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ा तो इस इलाके में जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई। नतीजा ये हुआ कि तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं और पूरी दुनिया पर महंगाई का दबाव बढ़ गया।
अब समझौते के बाद सबसे बड़ा फैसला यही बताया जा रहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा पूरी तरह खोला जाएगा और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी भी हटाई जाएगी। जैसे ही ये खबर सामने आई, तेल बाजार ने तुरंत प्रतिक्रिया दे दी। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट शुरू हो गई और ब्रेंट क्रूड चार प्रतिशत तक नीचे आ गया। (US-Iran Peace Deal)
अमेरिका-ईरान समझौते से भारत को बड़ी राहत
असल में भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। यानी अगर दुनिया में तेल महंगा होता है तो उसका सीधा असर भारत की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल महंगा होता है, डीजल महंगा होता है, ट्रांसपोर्ट महंगा होता है और आखिर में रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ जाते हैं। लेकिन अगर तेल सस्ता होता है तो इसका फायदा भी सीधा आम आदमी तक पहुंचता है।
सरकार का आयात बिल कम होता है, महंगाई पर दबाव घटता है और अर्थव्यवस्था को राहत मिलती है। इसलिए अमेरिका और ईरान के बीच हुई इस डील को भारत के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन कहानी केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है। इस समझौते के बाद ईरानी तेल की वैश्विक बाजार में वापसी का रास्ता भी खुल सकता है। (US-Iran Peace Deal)
ईरानी तेल की वापसी से भारत के लिए खुलेंगे नए अवसर
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में राहत देने और उसकी फ्रिज संपत्तियों को जारी करने पर भी सहमति बनी है। अगर ऐस होता है तो भारत के लिए एक और बड़ा मौका तैयार होगा। कभी भारत ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता था। खास बात यह थी कि कई बार यह तेल दूसरे विकल्पों के मुकाबले सस्ता पड़ता था और कई सौदों में डॉलर की बजाय रुपये में भुगतान की व्यवस्था भी होती थी, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह व्यापार लगभग बंद हो गया। (US-Iran Peace Deal)
अब अगर प्रतिबंध धीरे-धीरे हटते हैं, तो भारत एक बार फिर ईरानी तेल खरीद सकता है। इसका मतलब है ज्यादा विकल्प सस्ता तेल और कम खर्च। यानी एक तरफ वैश्विक कीमतें गिरेंगी, वहीं दूसरी तरफ भारत के पास तेल खरीदने के ज्यादा विकल्प होगें। दोनों चीजे मिलकर भारत को बड़ा फायदा दे सकती हैं।लेकिन तेल से भी बड़ा एक बड़ा रणनीतिक फायदा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग बात कर रहे हैं और वह है चाबहार पोर्ट (Chabahar Port)।
भारत की रणनीतिक ताकत बनेगा चाबहार कॉरिडोर
ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारत ने पिछले कई सालों में बड़ा निवेश किया। यह सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि भारत की एक बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा है। इसकी मदद से भारत पाकिस्तान को बाईपास करके अफगानिस्तान, मिडिल ईस्ट और आगे रूस तक व्यापारिक पहुंच बना सकता है। समस्या यह थी कि अमेरिका और ईरान के रिश्ते खराब होने की वजह से चाबहार प्रोजेक्ट हमेशा दबाव में रहता था। निवेश धीमा पड़ जाता था, नई योजनाएं अटक जाती थीं और कई बार अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भी दूरी बना लेती थी। लेकिन अगर अमेरिका और ईरान के रिश्तों में नरमी आती है, तो चाबहार पोर्ट को नई रफ्तार मिल सकती है। भारत वहां और निवेश कर सकेगा, व्यापार बढ़ा सकेगा और पूरे क्षेत्र में अपनी आर्थिक मौजूदगी मजबूत कर सकेगा। (US-Iran Peace Deal)
INSTC प्रोजेक्ट में फिर लौट सकती है जान
इसके साथ ही एक और महत्वपूर्ण परियोजना है, इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC। यह एक ऐसा व्यापारिक नेटवर्क है, जो भारत को ईरान, मिडिल ईस्ट और रूस से जोड़ता है। युद्ध के दौरान इस प्रोजेक्ट को लेकर भी अनिश्चितता बढ़ गई थी। लेकिन अब शांति की उम्मीद बढ़ने से इस कॉरिडोर में भी नई जान आने की संभावना है। इस समझौते का फायदा केवल व्यापार और तेल तक सीमित नहीं रहने वाले। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं, लाखों भारतीय वहां नौकरी करते हैं और हर साल अरबों डॉलर भारत भेजते हैं।
खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों के लिए राहत की खबर
पिछले कई महीनों से जिस तरह मिसाइल हमले, सैनिक कार्रवाई और तनाव बढ़ रहा था, उससे वहां रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा को लेकर चिंता थी। लेकिन अब हालात सामान्य रहते हैं, तो वहां रहने वाले भारतीयों को भी बड़ी राहत मिलेगी। इसके अलावा, समुद्री व्यापार भी आसान होगा। पिछले कुछ महीनों में जहाजों को लंबा रास्ता लेना पड़ रहा था, बीमा महंगा हो गया था और माल ढुलाई की लागत बढ़ गई थी। इसका असर भारत के आयातकों और निर्यातकों दोनों पर पड़ रहा था। (US-Iran Peace Deal)
भारत को मिल सकते हैं सात बड़े आर्थिक और रणनीतिक फायदे
अब हॉर्मुज खुलने से यह लागत कम हो सकती है और सप्लाई चेन फिर से सामान्य हो सकती है। यानी अगर पूरे मामले को एक लाइन में समझे तो अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति डील भारत के लिए सात बड़े फायदे लेकर आ सकती है। तेल सस्ता हो सकता है, पेट्रोल डीजल पर दबाव कम हो सकता है, महंगाई घट सकती है, भारत का आयात बिल कम हो सकता है, ईरानी तेल की वापसी हो सकती है, चाबहार पोर्ट और INSTC को नई रफ्तार मिल सकती है और खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा भी बेहतर हो सकती है।
यही वजह है कि दुनिया जहां इस समझौते को अमेरिका और ईरान के नजरिए से देख रही है। वहीं, भारत के लिए यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय समझौता नहीं, बल्कि आर्थिक, रणनीतिक और व्यापारिक लिहाज से एक बड़ी राहत की खबर बनकर सामने आई है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि यह डील जमीन पर कितनी देर से लागू होती है। क्योंकि अगर समझौते की शर्तें पूरी तरह से लागू हो जाती हैं तो आने वाले समय में इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था से लेकर आम आदमी की जेब तक महसूस किया जा सकेगा। (US-Iran Peace Deal)









