Uttar Pradesh: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। यह मामला 2024 की संभल हिंसा से जुड़ा है, जिसमें कोर्ट ने कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को अवैध करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि केवल पुलिस हिरासत में दिए गए कस्टोडियल कन्फेशन के आधार पर किसी व्यक्ति को एनएसए के तहत नजरबंद नहीं किया जा सकता।
Uttar Pradesh: क्या है पूरा मामला?
यह मामला नवंबर 2024 में संभल में हुई हिंसा से जुड़ा है। शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान वहां हिंसक झड़पें हुई थीं, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई थी। पुलिस ने इस हिंसा का मुख्य मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज को बताया था। अफरोज के खिलाफ कार्रवाई करते हुए प्रशासन ने 13 अक्टूबर, 2025 को उसके खिलाफ NSA के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश जारी किया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में इस हिरासत को सही ठहराया था और अफरोज की याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिस पर आज 29 सितंबर, 2026 को फैसला आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए यूपी सरकार की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने अफरोज की हिरासत को तत्काल प्रभाव से रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि एनएसए के तहत हिरासत का आदेश केवल इस आधार पर नहीं दिया जा सकता कि आरोपी ने पुलिस कस्टडी में अपना जुर्म कबूला है। पुलिस के सामने दिए गए बयान की कानूनी वैधता सीमित होती है और इसके साथ अन्य स्वतंत्र सबूतों का होना जरूरी है। (Uttar Pradesh)
पीठ ने माना कि हिरासत का आदेश जारी करते समय सक्षम प्राधिकारी ने मामले की परिस्थितियों की सही जांच नहीं की। इसे अवैध करार देते हुए कोर्ट ने कहा कि नागरिक की स्वतंत्रता को हल्के में नहीं लिया जा सकता।अवैध हिरासत के कारण याचिकाकर्ता के मौलिक अधिकारों के हनन के लिए कोर्ट ने राज्य सरकार पर 10 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। यह राशि यूपी सरकार को चुकानी होगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला पलटा
इससे पहले, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अफरोज की हिरासत को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट का मानना था कि हिंसा के कारण सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ गई थी और अफरोज को भविष्य में ऐसी गतिविधियों से रोकने के लिए एनएसए जरूरी था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हिरासत का आदेश सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन पर आधारित था, लेकिन इसमें ठोस आधारों की कमी थी। खास तौर पर यह तथ्य कि हिरासत का मुख्य आधार केवल पुलिस के सामने दिया गया बयान था, सुप्रीम कोर्ट को स्वीकार्य नहीं हुआ। (Uttar Pradesh)
संभल जामा मस्जिद सर्वे के दौरान हिंसा और मुल्ला अफरोज पर लगे आरोप
यह विवाद संभल की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर के दावों से जुड़ा है। एक स्थानीय अदालत ने मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया था। दावा किया गया था कि मस्जिद एक मंदिर के अवशेषों पर बनी है। सर्वे के दौरान 24 नवंबर 2024 को हिंसा भड़क उठी। भीड़ और पुलिस के बीच झड़प में गोलीबारी हुई, जिसमें 4 लोगों की जान चली गई और कई पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस ने मुल्ला अफरोज और अन्य को इस हिंसा को भड़काने का आरोपी बनाया था। अफरोज पर आरोप था कि उसने भीड़ को उकसाया और हिंसा की साजिश रची।
सुप्रीम कोर्ट ने NSA के इस्तेमाल में ठोस सबूत और कानूनी प्रक्रिया पर जोर दिया
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पुलिस और प्रशासन के लिए एक कड़ा संदेश है। अक्सर देखा जाता है कि पुलिस किसी आरोपी को जमानत मिलने से रोकने के लिए एनएसए या गैंगस्टर एक्ट जैसे कड़े कानूनों का सहारा लेती है। यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि राज्य की शक्ति का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता, भले ही आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों। पुलिस को अब एनएसए लगाने से पहले केवल कबूलनामे पर निर्भर रहने के बजाय ठोस सबूत और परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश करने होंगे। (Uttar Pradesh)
उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह फैसला एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि कोर्ट ने न केवल उसकी कार्रवाई को गलत ठहराया है, बल्कि भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया है।









